<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299</id><updated>2012-02-16T01:05:10.123-08:00</updated><category term='कविता'/><category term='कहानी'/><title type='text'>मनुहार</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>16</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-5200555881629161890</id><published>2011-11-15T18:19:00.001-08:00</published><updated>2011-11-15T18:25:03.368-08:00</updated><title type='text'>‘मानुष सत्य’ का हिमायत करती कहानियां</title><content type='html'>&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-pXvSF4deuDs/TsMdzP-xFfI/AAAAAAAAAJg/vrYoFJxLrJ0/s1600/mahip+singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-pXvSF4deuDs/TsMdzP-xFfI/AAAAAAAAAJg/vrYoFJxLrJ0/s320/mahip+singh.jpg" width="204" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;किताब&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;‘मानुष सत्य’ का हिमायत करती कहानियां&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;ना&lt;/b&gt;मी कथाकार &lt;b&gt;महीप सिंह&lt;/b&gt; की साम्प्रदायिक तनाव पर केन्द्रित कहानियों का संग्रह&lt;b&gt; ‘आठ कहानियां’&lt;/b&gt; इस संवेदनशील मुद्दे पर अनुभवों के नवीन वातायन खोलती है. बोधि पुस्तक पर्व के अंतर्गत प्रकाशित यह किताब विभाजन व दंगों की त्रासदी को इस तरह उजागर करती है कि पाठक के मन-मस्तिष्क में कथ्य देर तक गूंजता है. यही अनुगूंज धीरे-धीरे मानसिकता में बदलाव की जमीन तैयार करती है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महीप सिंह ने साम्प्रदायिक तनाव की विभिन्न स्तिथियों को करीब से देखा-भोगा है. विभाजन ने सीमाओं को तो बांट दिया, मगर दिल तो नहीं बांट सकते. कथाकार ने इन कहानियों के मिस बंटवारे से लोगों के मनों में फ़ूटने वाले फ़फ़ोलों की सुध ली है. उनकी कहानियों संकीर्ण दृष्टिकोण के सतही चित्र नहीं है बल्कि लोगों के मन के अविश्वास, भय व स्वार्थी तत्वों के छल-छद्मों को उजागर करने में उनका कथा कौशल देखते ही बनता है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किताब की पहली कहानी&lt;b&gt; ‘पानी और पुल’&lt;/b&gt; सचमिच एक मार्मिक कहानी है. बंटवारे के १४ वर्षों बाद मां-बेटे पंजासाहब की यात्रा के मिस अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुके अपने गांव से गुजरते हैं. मां की आंखों से बहती आंसू की धारा और जेहलम के पुल के नीचे से बहता पानी. आंसुओं की न तो कोई जाति होती है, न मजहब. चौदह वर्षों से अपने घर-गांव की स्मृतियों के साथ जीती मां और उन्हीं सरोकारों के लिए देर रात स्टेशन पर खड़े लोग. पोटलियों में केखक व उसकी मां को बादाम, अखरोट, किशमिश ही नहीं, अपना दिल सौंपते हैं. सराई गांव के लोगों का ‘वापस लौटने’ का अनुरोध विभाजन की त्रासदी पर पुल बनाने जैसा है. &lt;b&gt;‘दिल्ली कहां है&lt;/b&gt;’ संग्रह की उल्लेखनीय रचना है जिसमें विस्थापन की त्रासदी का ईमानदारी से अंकन हुआ है. बंटवारे ने दोनों तरफ़ मार की. नारायण दास जैसे लोगों की पीडा़ सचमुच करुणा जगाती है. अपनी शिल्पगत मौलिकता से यह कहानी मन को छूने वाले कथ्य के कारण बेजोड़ है. संग्रह की कहानी &lt;b&gt;‘आओ हंसे’&lt;/b&gt; पाठक को एक अलग अनुभव से गुजारती है. " क्या पता था इसी जीवन में एक बार फ़िर उजड़ना पड़ेगा..." (पृ.५०) नानकचंद का यह कथन उनके अंतस के डर, अनिश्चितता व आकुलता को खोलकर रख देता है. इधर नानकचंद का परिवार जालंधर छोडने की सोच रहा है, उधर निहालसिंह का कुटुम्ब दिल्ली से धंधा समेट कर पंजाब जाने मन बना रहा है. कैसी विवशता है यह? कहानी पाठक के सामने सवाल छोड़ जाती है,&lt;b&gt; ‘शहर’ &lt;/b&gt;कहानी का कथ्य तो नया नहीं, मगर उसके प्रतुति अनूठी है. कहानी के मुख्य पात्र ‘भाई साहब’ ने हालांकि कानपुर में दंगों से दुखी होकर जालंधर जाने का फ़ैसला कर लिया मगर उनकी कानपुर की समस्त यादें सताई हुई नहीं है. यही वह शहर है, जहां वे जन्में, पले-बढ़े, खूब पैसा कमाया, लोगों से दोस्ताना रिश्ता बनाया. क्या एक हादसे की वजह से उस शहर को अपनी जिंदगी से अलग करना संभव है? इस सवाल का जबाब भाई साहब के इस कथन में तलाशा जा सकता है- " अब तो होड़-सी लगी दिखती है-मैं अपने आपको उस शहर से समेटता हूं या वक्त मुझे समेटता है." (पृ.७१) &lt;b&gt;&amp;nbsp;‘सहमे हुए&lt;/b&gt;’ भी एक सशक्त कहानी है, रात का वक्त. सुनसान जगह पर खड़ी गाड़ी. बाहर दंगाईयों की भीड़, जो धीरे-धीरे गाड़ी के करीब आ रही है. दंगाईयों का मजहब ना मालूम, वैसे भी भीड़ का कोई मजहब कहां होता है? केबिन में चार दोस्त. सहकर्मी. एक हिंदु ब्राह्मण, एक हैरिजन, एक मुस्लिम व एक इसाई. बुरी तरह सहमे हुए. पसीने से तरबतर. एक-दूसरे को पलोसते चले जा रहे हैं. अब इससे अधिक भला कौन-सा सच बता सकती है कोई कहानी!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;‘एक मरता हुआ दिन&lt;/b&gt;’ के हरनाम सिंह के बहाने कथाकार एक कड़वे सच से साक्षात करवाता है.एक तरफ़ मध्यायुगीन बर्बरता जो आदमी को आदमी न मानकर जाति-समुदाय का प्रतीक मानकर मारने को उतारु है तो दूसरी ओर झौंपड़ी में विषम परिस्तिथितियों में जीने वाले लोग मदद का हाथ बढ़ाते हैं. कैसी दुनिया है ये? ऐसी क्यों है? &lt;b&gt;‘पहले जैसे दिन’&lt;/b&gt; का विषय-विन्यास अन्य कहानियों से किंचित अलग है. सचमुच विश्वास का पतला धागा टूट जाता है तब ऐसी स्तिथियां ही पैदा होती है. इस अविश्वास भरे माहौल में ‘मैं’ ‘हम’ बन जाते हैं. क्या पहले जैसे दिन फ़िर नहीं लौट सकते? सवाल पाठकों से यानी हमसे हैं. इसका जबाब हमें ही ढ़ूंढ़ना पड़ेगा. किताब की आखिरी कहानी &lt;b&gt;‘डर’&lt;/b&gt; में महीप सिंह का कथा-कौशल सर चढ़कर बोलता है , जब वे कीड़े-मकोड़ों के प्रतीकों से लोगों के दिल-ओ-दिमाग में पलते अविश्वास, डर व घृणा को बापर्दा कर देते हैं. इस अभरोसे ने ही तो इस देश को ऐसी स्तिथि में ला दिया हैं, जहां कोई अफ़वाह, छोटी-सी घटना बड़े तांडव का कारण बन जाती है. कहानी मे जो कीड़े-मकोड़े मरने-मारने को तैयार थे, वही अंत में दंगा पीड़ितों को राहत शिविर में भेजते वक्त पैसे, कपड़े-लत्ते, खाने-पीने की चीजें देते हैं. क्या यही है समाधान? कहानी पाठक को मंथन के लिए एक बड़ा सवाल सौंपती है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किताब की कहानियों में साम्प्रदायिक विद्वेष के सतही चित्र नहीं है बल्कि उन्होनें इस गम्भीर मुद्दे की मूल संवेदना को पकड़ते हुए अद्यतन अनछुए पहलुओं को उजागर किया है. वस्तुत: उनकी रचनाएं चंडीदास की उक्ति ‘सबाय उपरे मानुष सत्य’ की हिमायत करती नजर आती है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;-मदन गोपाल लढ़ा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;१४४, लढ़ा-निवास,&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;महाजन, बीकानेर-३३४६०४&lt;/div&gt;&lt;div&gt;madanrajasthani@gmail.com&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-5200555881629161890?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/5200555881629161890/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=5200555881629161890' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5200555881629161890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5200555881629161890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='‘मानुष सत्य’ का हिमायत करती कहानियां'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-pXvSF4deuDs/TsMdzP-xFfI/AAAAAAAAAJg/vrYoFJxLrJ0/s72-c/mahip+singh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-445507381167660947</id><published>2011-09-01T06:05:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T06:09:45.077-07:00</updated><title type='text'>सामने वाली स्त्री</title><content type='html'>&lt;br /&gt;गुजराती कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;सामने वाली स्त्री&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मूल - हिमांशी शेलत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माया हांफती हुई डिब्बे में दाखिल हुई। हाथ में भार होने के कारण ही सही उसे एक सप्ताह में तीसरी बार ऎसा लगा कि थोड़ा वजन कम करना होगा। खुद के बारे में इतनी लापरवाही ठीक नहीं। वक्त मिले कि नहीं मिले, तब भी चलना पड़ता है, कसरत करनी पड़ती है...कान के पास छूटी लट को पिन में फंसाने की कोशिश करते हुए उसे ध्यान आया कि आज फिर पिन लगाना भूल गई। अब सफर में लटें उड़ती ही रहेंगी। उसे खुद पर गुस्सा आया। ऎसे ही वापी पहुंच जाती कि तभी उसका ध्यान भंग करता एक सवाल एकाएक उसके सामने आकर खड़ा हो गया।- मुंबई जा रही हैं आप?सामने देखा। पूरा खिला हुआ, सुख से धुला और सुख की बूंदों से दिपदिपाता चेहरा। गालों की सुर्खी, होंठों का गुलाबीपन, चमकते रेशमी बाल और चेहरे के अनुरूप मेक-अप। ड्रेस भी चालू नहीं, सफेद टी-शर्ट और लम्बा आसमानी स्कर्ट। बेग-पर्स सब कीमती और इस देश के नहीं लगते जैसे। उसके चुस्त शरीर में से आती सुगन्ध किसी महंगे परफ्यूम की होगी। विदेश में ही रहती होगी यह। निश्चित रूप से अमरीका में। माया अपनी तरफ आए सवाल का जवाब देते-देते सामने वाली स्त्री को देखती रही।- नहीं, मुंबई नहीं, वापी।उसके बाद कुछ पल दोनों महिलाएं खिड़की में से बाहर देखती रहीं। ट्रेन चली तब वे चारों आंखें एक घड़ी अंदर एक घड़ी बाहर आती-जाती रहीं। प्लेटफार्म के कोलाहल की गूंज से जब डिब्बा बाहर निकला तब जरा हवा आई।- उफ...मुझसे यहां की गर्मी सहन नहीं होती। अनुमान सच्चा। परदेश से ही आई हैं।- आप वापी में ही रहती हैं?माया को लगा कि परदेश रहे चाहे देश में, पंचायती तो एक जात की करती है। अब क्या कहुं इसे?- हां, वापी में।उससे ऎसे ही बोला गया। न ज्यादा न कम। फिर मान- सत्कार के रूप में उसने भी सामने वाली स्त्री से पूछ लिया।- आप कहां...अमरीका से?- हां, दस वष्ाोü से केलिफोर्निया हूं...मम्मी से मिलने आई हूं। बहुत बीमार है.... बड़ी बहन नवसारी रहती है। उसी से मिलने जा रही हूं। कल वापस वडोदरा।बात आगे नहीं बढ़े इसलिए माया ने पर्स में से एक किताब निकाली और ऎसी अधीरता से एक पन्ना खोलकर सिर झुका लिया जैसे उसे पढ़ने में बहुत मजा आ रहा हो। ऎसा करते हुए भी सामने बैठी स्त्री का निरीक्षण चालू ही रहा। माया ने गुपचुप देख ही लिया कि उस महिला ने अपना मोटा पर्स अपनी गोद में रखा था।वह उसमें कुछ ढंूढ़ रही थी। पर्स में आम तौर पर जो निकलना चाहिए, उससे ज्यादा ही निकला। डायरी, हेयर-ब्ा्रश, लिपस्टिक, रूमाल, कागज, पांच-दस सिक्के इन सबको अलग करती हुई वह अपनी तलाश में खोयी हुई थी। उसकी अंगुठियां सुंदर थी, नाखुन रंगे हुए और दो अंगुठियां पहनी हुई। बाहर निकाले हुए सामान से भी खुशबू आ रही थी। तभी खिड़की में से पवन का एक झौंका आया और उसके साथ ही गोद में पड़ा एक लिफाफा उड़ गया। ओह... आउच...जैसा माया ने सुना और उसने अपने करीब आकर गिरा लिफाफा उठाकर उसे पहली स्त्री को दे दिया।- थैन्क्यू।माया केवल हंसीं। सामने वाली स्त्री लिफाफा पर्स में डाल रही थी, तभी मानो उसे कुछ याद आया, उसने लिफाफे में से तीन फोटो निकाले। पहले उसने खुद देखे, फिर माया के सामने रख दिए।- साथ ही रखती हूं। मेरा सन और हसबेन्ड....फोटो रख दिए तो शिष्टाचारवश देखना पड़ा। माया ने किताब बंद की, निशान रखने के लिए पृष्ठ मोड़ा और फोटो हाथ में लिए। अमरीका में हो ऎसा घर और अमरीका में हो ऎसा वर। चमकदार कपड़े, पीछे झूला, सफेद फूलों की क्यारी, दो बड़े पेड़, हरी-भरी पहाड़ी से नीचे जाता रास्ता, महंगी सफेद कार और नजदीक बॉल लेकर खड़ा गोलमटोल लड़का। सातेक वष्ाोü का होगा....एकदम व्यवस्थित, रंगीन और मुलायम सुख।- सरस है।माया को लगा कि इतना तो कहना ही चाहिए, खासकर जब एक अनजान महिला अपने सुख को बताने के लिए उत्सुक हो। ऎसा लगा जैसे सामने वाली स्त्री खुश हो गई हो।- मैं तो उन दोनों को छोड़कर आती ही नहीं। इन दिनों विक्रम को वहां बहुत काम था इसलिए रोनक को उसके पास छोड़कर मैं आ गई।अब माया का भी बातों का मन हुआ। बात आगे चल पड़ी।- आप भी वहां नौकरी करती हैं?- ओह....नो...नो...विक्रम के वहां तीन बड़े स्टोर्स हैं। रोनक के जन्म से पहले एक आध वष्ाü नौकरी की थी। फिर तो यूं ही...मौज ही कर रही हूं।वह फिर हंसी। सुखी लोग ऎसे ही हंसते रहते हैं। बार-बार। उसके दांत सुन्दर हैं। एक सरीखे और सफेद। जो विदेश रहते हैं उनके दांत अधिक सफेद होते हैं? माया पल भर उसे तो पल भर खिड़की से बाहर देखती रही। बाहर बादलों ने घेरा बना लिया था। वापी पहुंचते-पहुंचते बारिश शुरू हो जाएगी। खड्डेदार गंदा रास्ता....- आप वापी में नौकरी करती हैं?माया ने इस सवाल का अपनी तरफ आता देखा जरूर लेकिन जवाब देने में जल्दबाजी नहीं की। खिड़की के बाहर बादलों की काली छाया के नीचे से हरे-भरे खेत के बीच में बना एक छोटा-सा घर गुजर गया। ऎसा लगा जैसे उसके आंगन के पीले फूलों का रंग हवा में उड़ा हो। वहां पास में एक मोर टहल रहा था या फिर कुछ और?- वापी में हमारा फार्म है। थोड़ी खेती, थोड़े आम और चीकू....केलों की छोटी सी बाड़ी है।- वाउ...मस्ट बी नाईस....- हां, बहुत सरस जगह हैं। शांत...जहां रहने का मन करे।- आपके कोई बेटा-बेटी?- नहीं, केवल हम दो...फार्म पर जो लोग काम करते हैं, वही हमारा कुटुम्ब।माया बेधड़क बोल गई। कहीं कुछ हिचकिचाहट नहीं।- टाइम पास हो जाता है ठीक से? आई मीन गांवों में सोश्यल लाइफ जैसा कुछ नहीं होता है ना...- देखो ना, शनि-रवि तो हम आस-पास कहीं चले जाते हैं। बहुत खूबसूरत स्थान हैं, बोरडी या उमरगाम या फिर खानवेल...और आम दिनों में फार्म और बगीचे में कामकाज...मुझे गार्डनिंग का शौक है....अब भी कुछ बाकी जानकर माया लगातार बोलती गई।- सप्ताह में दो दिन म्यूजिक क्लास में जाना होता है। रियाज में भी काफी वक्त निकल जाता है। मेरे हसबेन्ड धीरेन को...बहुत शौक है क्लासिक का....- ओह इट्स वैरी इंटरेस्टिंग....बादलों की घटा गहरी हो गई थी। डिब्बे में भी अंधेरा छाने लगा था। माया ने किताब बंद कर दी। बाहर दरख्त और आदमकद घास जैसे झुक रहे थे, उससे हवा की प्रचंड ताकत का अंदाजा लग रहा था। हवा आज सब बराबर करके ही छोड़ेगी। माया ने आराम से बैठने के विचार से पांव ऊपर करके पालथी लगा ली।- मुझे तो बड़ी बहन के नए घर का पता भी नहीं। आई हेव द फोन नम्बर...वे लोग हाल ही में शिफ्ट हुए हैं इसलिए....- आपको लेने तो आएगा ना कोई?- या ....कल ही बात हुई फोन पर। स्टेशन पर कोई आ जाएगा। मैं वहां की लाइफ स्टाइल की ऎसी आदी हो गई हूं कि सफर में नर्वस हो जाती हूं...घबराहट-सी होने लगती है।माया कुछ नहीं बोली। उसमें बोलने जैसा कुछ था भी नहीं।बातचीत थम गई।बाहर फुहारें शुरू हो गई। ऎसी बरसात माया को बहुत अच्छी लगती है। मगर फुहारें कभी भी मूसलाधार बारिश में बदल सकती है। इस चिंता में वह अपना सामान देखने लगी।- मेरा बेटा तो कहता है कि मोम आप ट्रेन में ट्रेवल करेंगी तो बीमार पड़ जाएंगी। आते-जाते लोग यहां की बीमारियों खासकर मलेरिया की बातें करते रहते हैं इसलिए उसको लगता है कि इंडिया में तो लोग बीमार ही रहते हैं।- आपका लड़का यहां आया है कभी?- नहीं, एक बार भी नहीं। उसने तो इंडिया देखा तक नहीं। उसका मन ही नहीं होता आने का....- यू मस्ट बी मिसिंग हिम वैरी मच.....माया डिब्बे में बैठने के बाद पहली बार अंग्रेजी में बोली।- या, वैरी मच....सामने वाली स्त्री केवल इतना कहकर अपनी दुनिया में खो गई। शायद विक्रम और रोनक की उपस्थिति अनुभव कर रही होगी...माया ने कल्पना में उसे उन दोनों के साथ हाथ में हाथ डाले खड़े देखा। फिर उसकी नजरों से नजरें मिली तो माया हंस पड़ी। वह भी हंसी। संतोष्ा, आनन्द, सलामती और शांति छलछला रहा था। यह सब छलका और चारों तरफ बहने लगा।तभी माया को याद आया कि अभी तक उसने सामने वाली स्त्री की बीमार मम्मी के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। यह तो बिलकुल अविवेक ही गिना जाएगा।&lt;br /&gt;- आपकी बा को क्या हुआ है&lt;br /&gt;हार्ट ट्रबल, हाईपर टेन्शन। मेरी तो इच्छा होती है कि मम्मी को वहीं ले जाऊं, परन्तु यहां भाई नहीं मानता। असल में तो मम्मी भी आना नहीं चाहती। कहती है कि मुझे अच्छा नहीं लगता। सभी सगे-सम्बन्धी जो यहां हैं।&lt;br /&gt;- सही बात है उनकी। जहां रहे हों, बुढ़ापे में वहीं अच्छा लगता है।वह ऎसे बोली जैसे डब्बे के अंदर कहीं लिखे सूत्र को पढ़ रही हो।एक छोटा स्टेशन तेजी से निकल गया। दो-तीन जनों ने खड़े होकर सामान संभाला और दरवाजे की तरफ जाने की तैयारी करने लगे। शायद नवसारी आने वाला था।&lt;br /&gt;- लीजिए, आपका स्टेशन आ गया।सामने वाली स्त्री ने बेग-पर्स लिए, टी-शर्ट खींच कर ठीक की। बालों में अंगुलियां फेरी, नजाकत से।- चलो, बाय...थैंक्स फॉर योर कम्पनी....वह नीचे खड़ी रही तभी भीड़ में उसके सामने एक हाथ हिला।माया ने देखा कि उसे लेने शायद उसकी बड़ी बहन आई थी। दोनों मिलीं और मिलते हुए शायद रोई भी। हो सकता है ऎसा न भी हो। दूर से ऎसा लगा हो। बारिश का जोर बढ़ गया था। वापी तक तो झमाझम होने लगेगी। वापी में तकलीफ होगी। बडे बेग में सिलाई कार्य के कुछ नमूने थे। ऑर्डर देने के लिए व्यापारी ने कुछ नमूने मांगे थे। पसंद आ जाए तो अच्छा काम मिल जाए। ठेठ पैंदे तक पहुंची उपेक्षा और पीड़ा का भान होते हुए भी माया ने जरा मस्ती महसूस की। कितनी आसानी से उसने खुद को धीरेन के फार्म हाउस में फिट कर दिया! बाकी धीरेन के पास अब फार्म है अथवा नहीं, किसे खबर है! उसने विवाह किया है या नहीं, इसका भी क्या पता! यह तो वष्ाोü पुरानी एक सुबह आज फिर उसकी जिन्दगी में उग आई थी। उस सुबह धीरेन उसको देखने आने वाला था...नहीं...उन दोनों की मुलाकात तय हुई थी, और अगर धीरेन को वह पसंद आ जाती तो दोनों की शादी-बाकी सब कुछ तो तय ही था।यह अलग बात है कि उसे धीरेन बहुत पसंद आया था। बी.ए. करने के बाद जब उसे अच्छी नौकरी नहीं मिली तब अपनी पसंद के सबसे आखिरी क्रम का सिलाई कार्य करना पड़ा। उसकी नाकामियों की सूची में धीरेन के अलावा भी बहुत कुछ था और यह सूची लम्बी होती जा रही थी।फार्म हाउस और धीरेन को एक तरफ रख कर माया ने वापी के बारे में सोचा। सिंधी व्यापारी का ठिकाना दूर है इसलिए रिक्शा करना पड़ेगा। बौछारों से बचने के लिए उसने खिड़की का कांच नीचे खींच दिया। फिर भी दुपट्टा भीग ही गया। उसने दुपट्टे को जरा खींचकर फटकारा और मुंह के आगे करके लहराया ताकि जल्दी से सूख जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;** *** *** ***&lt;br /&gt;बड़ी बहन ने उसके कंधों को थपथपाया और अपने पुष्ट हाथों से उसे बाहों में भर लिया। रूमाल से उसकी आंखें पूंछी, गाल पर अंगुलियां फेरी, पौर गीले हो गए।- कोई न कोई रास्ता निकलेगा। हम हैं ना। रोनक को यहीं रखूंगी। यहीं पढ़ेगा। चिंता मत कर।उसकी आवाज भारी हो गई। मुश्किल से बोल पाई।- मगर विक्रम माने तब ना। मैं नहीं जानती रोनक को यहां अच्छा लगेगा या नहीं लेकिन इतना तय है कि मैं अब वहां नहीं रह सकती।- ऎसा कुछ नहीं है। वहां भी महिलाएं अकेली रहती होंगी। तलाक तो वहां बहुत कॉमन है, है ना?- है, मगर मुझे वहां रहना ही नहीं...- हमें क्या पता कि विक्रम ऎसा.....बड़ी बहन का वाक्य अधूरा ही रहा, क्योंकि वह लगातार रोए जा रही थी...जैसे रूकेगी ही नहीं।&lt;br /&gt;कार से दौड़कर आए ड्राइवर ने छतरी खोलकर उसके ऊपर लगा दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद -डॉ. मदन गोपाल लढ़ा&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-445507381167660947?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/445507381167660947/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=445507381167660947' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/445507381167660947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/445507381167660947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='सामने वाली स्त्री'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-8103464260458503624</id><published>2011-06-25T03:19:00.000-07:00</published><updated>2011-06-25T03:24:07.335-07:00</updated><title type='text'>फ़ोटो एलबम देखते हुए</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-guTFoToS8Qk/TgW2qfuLrXI/AAAAAAAAAE8/tW9taARvgq0/s1600/P1010731.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-guTFoToS8Qk/TgW2qfuLrXI/AAAAAAAAAE8/tW9taARvgq0/s200/P1010731.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622100551027895666" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;फ़ोटो एलबम देखते हुए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-मदन गोपाल लढ़ा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१&lt;br /&gt;श्वेत-श्याम चित्र् में&lt;br /&gt;छुपे हुए हैं&lt;br /&gt;कितने सारे रंग ।&lt;br /&gt;देखते ही देखते&lt;br /&gt;हरी हो जाती है याद&lt;br /&gt;चेहरा सुर्ख गुलाबी&lt;br /&gt;चमकने लगता है&lt;br /&gt;आँखों का नीलापन ।&lt;br /&gt;कहाँ से उतर आता है&lt;br /&gt;रंगों का इंद्रधनुष&lt;br /&gt;जब भी देखता हूँ&lt;br /&gt;पुराना एलबम ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;कसम से&lt;br /&gt;मैं ही हूँ ये&lt;br /&gt;यकीन नहीं हो रहा&lt;br /&gt;पढो&lt;br /&gt;फोटो के पीछे लिखा है&lt;br /&gt;मेरा नाम&lt;br /&gt;नाम के नीचे दिनांक&lt;br /&gt;सचमुच&lt;br /&gt;तब ऐसा ही लगता था&lt;br /&gt;मैं ।&lt;br /&gt;आइने में झाँकते हुए&lt;br /&gt;पूछता हूँ खुद से&lt;br /&gt;आखिर क्यों बदल गया इतना&lt;br /&gt;सहसा&lt;br /&gt;खुद को नहीं हुआ यकीन&lt;br /&gt;अपना फोटो देखकर&lt;br /&gt;पुराने एलबम में ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;मानो थम-सा गया हो&lt;br /&gt;वक्त का पहिया&lt;br /&gt;या कोई खींच रहा है&lt;br /&gt;पीछे&lt;br /&gt;समय की सूई ।&lt;br /&gt;अचंभित हूँ मैं&lt;br /&gt;कैसे पहुँच गया&lt;br /&gt;फिर उसी घडी में&lt;br /&gt;जब उतारी थी फोटो&lt;br /&gt;पुराने घर की बाखल में&lt;br /&gt;दादा-दादी के साथ&lt;br /&gt;हम तीनों भाई-बहन&lt;br /&gt;यस&lt;br /&gt;स्माइल प्लीज&lt;br /&gt;ओ.के. !&lt;br /&gt;क्लिक की आवाज के साथ&lt;br /&gt;कैमरे में कैद हो गया&lt;br /&gt;वह पल ।&lt;br /&gt;चौंक उठता हूँ&lt;br /&gt;क्या यह सपना है ?&lt;br /&gt;गर सपना भी है&lt;br /&gt;तो कितना सुहाना है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;बेटा कहता है&lt;br /&gt;ये मेरे पापा हैं&lt;br /&gt;देखो कैसे लगते हैं&lt;br /&gt;बिलकुल मेरे जैसे ।&lt;br /&gt;बीवी चाव से दिखाती है&lt;br /&gt;किटी पार्टी की महिलाओं को&lt;br /&gt;पुराना एलबम&lt;br /&gt;लजाकर कहती है -&lt;br /&gt;‘ये उनकी फोटो है&lt;br /&gt;कितने मासूम लगते हैं।’&lt;br /&gt;मगर अम्मा चुप है&lt;br /&gt;फोटो देखकर भी&lt;br /&gt;नहीं फूटते उसके बोल&lt;br /&gt;सोचती है&lt;br /&gt;जो दिखता है फोटो में&lt;br /&gt;अब कहाँ है वह ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;बाइस लडके व सात लडकियाँ&lt;br /&gt;बीच में गुरुजन&lt;br /&gt;बी.ए. फाइनल इयर की&lt;br /&gt;विदाई के मौके&lt;br /&gt;खिंचवाया था यह ग्रुप फोटो ।&lt;br /&gt;वक्त की गर्द ने&lt;br /&gt;फोटो के साथ&lt;br /&gt;धुंधला दिया है स्मृतियों को ।&lt;br /&gt;मैं बताता हूँ चाव से&lt;br /&gt;एक-एक सहपाठी का नाम&lt;br /&gt;याद करके&lt;br /&gt;बरबस ही ठहर जाता हूँ&lt;br /&gt;उस चेहरे पर आकर&lt;br /&gt;जिसे ताक रहा हूँ मैं&lt;br /&gt;फोटो में भी ।&lt;br /&gt;जानबूझकर&lt;br /&gt;भूलने का दिखावा करता हूँ&lt;br /&gt;मगर अंदर ही अंदर&lt;br /&gt;हरा हो जाता है&lt;br /&gt;कोई ठूंठ&lt;br /&gt;फूटने लगती है&lt;br /&gt;हरी-भरी शाखाएँ ।&lt;br /&gt;सहसा&lt;br /&gt;सिमट जाती हैं शाखाएँ&lt;br /&gt;जब कहती है बिटिया&lt;br /&gt;‘‘पापा अगली फोटो दिखाओ ना !’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;पुराना एलबम देखने के बाद&lt;br /&gt;लगता है&lt;br /&gt;जैसे लौटा हूँ&lt;br /&gt;अतीत की यात्र से ।&lt;br /&gt;पत्थरों और शब्दों की तरह&lt;br /&gt;फोटो में भी&lt;br /&gt;बसता है इतिहास&lt;br /&gt;पाकर नम निगाहों का स्पर्श&lt;br /&gt;हो जाता है हरा&lt;br /&gt;अतीत की किताब का&lt;br /&gt;कोई पृष्ठ ।&lt;br /&gt;फोटो की मार्फत&lt;br /&gt;फिर-फिर लौटता है&lt;br /&gt;इतिहास&lt;br /&gt;वर्तमान में ।&lt;br /&gt;=====================================&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-8103464260458503624?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/8103464260458503624/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=8103464260458503624' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8103464260458503624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8103464260458503624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='फ़ोटो एलबम देखते हुए'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-guTFoToS8Qk/TgW2qfuLrXI/AAAAAAAAAE8/tW9taARvgq0/s72-c/P1010731.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-3173670125194438256</id><published>2011-05-28T09:07:00.000-07:00</published><updated>2011-05-28T09:14:35.614-07:00</updated><title type='text'>म्हारै पांती री चिंतावां : आरसी हरफ़ रै आंगणै</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);font-size:180%;" &gt;रचनात्मक प्रतिबद्धता की अनुगूँज&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब तक हमने जितने भी क़िस्से-कहानियाँ सुने-पढे हैं, उन सब में अपने हिस्से के लिए, अपने अधिकारों के लिए जूझते-लङते इंसान से साक्षात् होते रहे हैं । अदालती दरवाज़ों में भी मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ वक़ीलों के बुलंद तर्कों की अनुगूँज सियासतदारों के आराम में ख़लल डालती रही है । ज़र, जोरू और ज़मीन के लिए रतनाती रेत वाले इस बियाबान में जब कोई व्यक्ति अपने हक़, अधिकार और हिस्से में धनात्मक अभिवृद्धि के मनुज-सुलभ फ़ॉर्मूले को छोड़कर बिलकुल अलहदा अंदाज़ में अपने हिस्से की चिंताओं, प्रतिबद्धताओं और सामाजिक सरोकारों व ज़िम्मेदारियों की बात करे तो मन उस पगलाये-बौराये से अनायास जुड़ जाता है । यह मानव प्रकृति है । धारा के विपरीत गतिविधि पर हमारा ध्यान तत्काल जाता है । अख़बारों में कुछ विज्ञापन छपते हैं, लिखा होता है - इसे न पढें, हमें उसे पूर्ण मनोयोग से और प्राथमिकता से पढते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक इसी तर्ज पर पाठक मदन गोपाल लढा की काव्य कृति ‘म्हारै पांती री चिंतावां’ की संवेदना से जुङता है । मैं भी इस उत्ताल संवेदना प्रवाह और सामाजिक प्रतिबद्धता के बहाव में बहने से स्वयं को नहीं रोक पाया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लढा की कविताओं का मुख्य-स्त्रोत सहजता, सरलता, सौम्यता और मानवीय नैसर्गिकता है । इन कविताओं में ग्राम्य जीवन की सहजता-सरलता है, तो शहरी जीवन की ख़ुद में सिमटे रहने की तटस्थता और रचनाकार मन की ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की सदाशयी प्रतिबद्धता भी है । कवि का मन शब्द, कविता, कवि और प्रणय की गहराईयों में डूबता-उतरता रहता है । वह सागर के गोताखोर की तरह डुबकी लगाता है और जो कुछ भी उसे हाथ लगता है, हमें पकड़ाता चलता है । लढा की यही ख़ास ‘ऑरिजिनेलिटी’ है । बनाव-श्रृंगार के षहरी दमघोटू वातावरण की तरह रची जाने वाली आज की कविता से सर्वथा अलहदा यह अंदाज़ लढा की कविताओं को पढने, जानने और समझने की ललक पैदा करता है ।&lt;br /&gt;अन्तर्मन की अमूर्त संकल्पनाएँ लढा के काव्य में स्वतः उद्भूत संवेदनाओं के रूपाकार में पाठक के समक्ष उपस्थित होती है और उनकी यह काव्य-प्रकृति - आओ लढा को जाने’ का आह्वान करती है । इसी ताकत के बलबूते पर समूचे जगत की यात्रा कवि अपनी कविता में कर लेता है -&lt;br /&gt;‘गुवाङ तो गुवाङ/म्हैं तो घूम लैवूं/आखै जग में/कविता रै ओळै-दोळै/ एकलो बैठ्यो ई...!’&lt;br /&gt;पैमाईश की बात करें तो कवि का कर्म मार्मिकता और वैचारिकता है । कवि ने संग्रह की कविताओं में अपने अंतस की अकुलाहट और चिन्तनाओं को अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से रचा और उकेरा है । वह बेहद सलीक़े से अपने भावों को एक के बाद एक रखता-जमाता गया है । तिलिस्म या शब्दाडंबर कहीं नहीं है । यह कवि की ख़ामोशियों का कोलाहल है । राजस्थान का लोक-जीवन और लोक-परिवेश अपनी समूची ऊर्जा, सौंदर्य, संघर्श और विद्रूप विसंगतियों के साथ इन कविताओं में पाठक से रूबरू होता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्मृतियों की जमीन तलाशता कवि कभी व्यवस्थागत बेबसी (कोनी चालै जोर) को रेखाँकित करता है तो कभी अर्थवाद की अंधदौड़ में अपनी अर्थवत्ता खोते शब्द को ढूँढने का उपक्रम दिखता है । हेत के रंगों से सरोबार हो कभी प्रीत के पन्नें हमसे साझा करता है तो कभी अपनी अधूरी अरदास के दुःख को सार्वजनिक कर कवि भाई को कवि कर्म के मूल्यों के अनुरक्षण हेतु संजीदगी बरतने का निवेदन करता दिखता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ वर्षों पूर्व एक पुस्तक छपी थी -‘वैनिशिंग वॉयसिस ।’ इस पुस्तक में भविष्यवाणी की गई थी कि अगर देशज भाषाओं ने अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष न किया तो वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप अगले सौ वर्षों में दुनिया की 90 प्रतिशत भाषाएँ ख़त्म हो जाएगी । ‘सरवाइवल ऑफ द फ़िटेस्ट’ की कहावत भाशाओं पर भी लागू होगी । इसी पीड़ को आत्मसात करते हुए लढा ‘म्हनैं म्हारी भासा चाईजै’ में कहते हैं -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;‘म्हैं जाणूं / भासा बिहूणो हुवणो / कित्तो दुखदायी है / जियाँ गाय बिना खूंटो / टीकै बिना लिलाङ / अर मूरत बिना हुवै मिंदर / ठीक बियाँ ई / भासा बिना हुवै मिनख !’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लढा की कुरेदती-कचौटती इस दृढ-प्रतिज्ञ आश्वस्ति से मुझे शुकून मिला । ‘म्हारै पांती री चिंतावां’ लेकर मैं बाहर पार्क में आ बैठा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली का त्यौंहार । बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे थे । सबके चेहरों पर इन्द्रधनुष पसरे हुए थे । मैं दो भागों में बँट गया । कभी होली के हुड़दंग के रंग मेरा ध्यान खींचते, तो कभी भाषा, कथ्य और चरित्र के तमाम बिंदुओं पर पूर्व स्थापित धारणाओं को जगह-जगह तोड़ती चलती और कविताई का नया मुहावरा गढ़ती लढा की कविताओं की आंतरिक बैचेनी जीवन के विद्रूप के बीच मनुष्य के लिए ‘स्पेस’ तलाशती मुझे कचोट गई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुतलाती-बलखाती लड़की के गालों के गड्ढे में भरी हरी गुलाल देख कर लढाजी की ये पँक्तियाँ आँखों में तैर गई -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कैङी मुलाकात है आ / ओ म्हारी जोगण !/ ज्यूं-ज्यूं म्हैं थनैं जाणूं / खुदोख़ुद नैं बिसराऊँ/ अंतस री अँधेरी सुरंग में उतरूँ ! / सांची बता ! / थारै मिलणै रो मतलब / कठैई म्हारो गमणो तो कोनी ?’ (पृ.18)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अभी इस प्रणयानुभूति में ही उलझा था कि बाहर शोर सुनाई दिया । किसी उत्पाती बच्चे ने उल्लास के अतिरेक के चलते पानी की बाल्टी भर कर लङकी पर डाल दी । प्रणय का हरा रंग पानी रंग में रंग अन्तर्मन को तलाशने लगा -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘कोई ज़रूरी कोनी / कै सबद रो अरथ / असल ज़िंदगाणी में / बो ई हुवै/ जिको मंडयोङो हुवै / सबदकोस में/ आपरै सारू हरख रो मतलब / उछक हुय सकै / पण म्हारै खातर इण रो अरथ / फगत रोटी है !’(पृ.29)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी रंग की नमी से प्रभावित मैं अपने ही भीतर उतरने लगा । भाई लढा की दार्शनिक अभिव्यक्तियों के अर्थ तलाशने में जुट गया परन्तु तभी श्रीमतीजी की आँखों का लाल रंग मुझे भीतर तक कंपकंपा गया और लेनदारों की सूची हाथ में पकड़ा कर अर्थ की प्रभुसत्ता बता गया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;‘मेह, मौत अर सपनां ई / अळघा है / बाज़ार री जद सूं / नींतर घर अर मन तांई / पूगग्या है उण रा हाथ / भाङै मिल जावै कूख तकात..!’(पृ.10)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंग में भंग पङ गया । बैचेन मन मेरे चेहरे के पीले पङते रंग को देख कर बोल उठा -&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;‘डग-डग डोलतो जीव / हियै रै आंगणै / झोला खावै / लारै भाजै / अेक अणखावणी छियाँ / दङाछंट !/ खुदोख़ुद सूं भाजतो जीव / अंतस री आरसी में सोधै/ अणसैंधा उणियारा / अर बांचै / ओळूं री धरती माथै / जूण रा आखर...!’ (पृ.9)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन के विश्वास ने चेहरे के पीले पङते रंग पर सफ़ेदी पोती -‘&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रळ सको तो/ अेकामेक हुय जाओ /इण मुखौटा आळी भीङ में / का पछै म्हारै दांई / धार लेवो मौन !’ (पृ.20)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन सत्य के सफ़ेद रंग ने धीरज की थपकी देकर मुझे आश्वस्त करना चाहा पर तभी किसी मनचले बच्चे ने दूसरे के चेहरे को काले रंग से पोत दिया और खिलखिलाने लगा । ‘ब्लैकरोज़’ बना बालक दरवाज़े के ग्रिल के बीच से मुझे निहारने लगा । मैं उसकी डरावनी शक्ल से बचने के लिए लढाजी की कविता पलटने लगा -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;‘बा लपर-लपर कर’र बूक सूं / तातो लोही पीवै / अंधारघुप्प में बिजळी दांई चमकै / उण री आंख्यां / मून मांय सरणाट बाजै / उण री सांस / म्हैं एकलो / डरूं धूजतो......!’ (पृ.19)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगों की इस उठा-पटक से मैं विचलित था । मैं स्वयं को समेटने लगा । बच्चों के चेहरों में उनके नाम और पहचान एक हो गये । उन्हें अलग-अलग देख पाना अब सम्भव नहीं था । ठीक उसी तरह, जिस तरह लढाजी की कविताओं का वस्तु-वर्णन और भाव-वर्णन समग्रता के साथ समन्वित हो जाता है । रंग गड्ड-मड्ड हो गये और बन गया मटमैला रंग ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;-‘पैलङी तारीख नैं हाल सतरह दिन बाकी है / पण बबलू री फीस तो भरणी ई पङैला / मोखाण ई साजणो हुसी...!’ (पृ.63)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पल-पल दरकते रिष्तों को थामे रखने के कोशिश, परिस्थितिजन्य और परिवेशगत विद्रूप में उलझी आदमियत, रचनाकार का आत्म-संघर्ष, रागात्मकता की शून्यता और संवादहीनता की लौकिक चिंताएँ, जीवन स्थितियों से उत्पन्न धारणाएँ व बैचेनियों, छोटी-छोटी खुशियों में स्वप्न का संसार रचते मन की अभिव्यक्तियों और आभासी सुख की तलाश लढा की कविताओं में आकार लेती दिखती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द, कविता और प्रेम वह आधार है, जिस पर यह पूरी पुस्तक खड़ी है । अधिसंख्य कविताओं में कवि भिन्न-भिन्न कोणों से यही सब कुछ देखता है । यही इस संग्रह की सीमा है और यही वैशिष्ट्य ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़-सुथरे मुद्रण वाली इस पुस्तक की गुणवत्ता इसी से स्पष्ट है कि इसे प्रकाशन से पूर्व ही कमला गोइन्का फ़ाउण्डेशन, मुंबई का किशोर कल्पना कांत युवा साहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हो चुका है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ कविताएँ ‘लाऊडनैस’ से नहीं बच पाई है और कुछ परिमार्जन की माँग करती है । बाजवूद इसके, आज की राजस्थानी कविता के मिज़ाज़ को जानने के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 204, 0);"&gt;कृति- म्हारै पांती री चिंतावां&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कवि- मदन गोपाल लढा&lt;br /&gt;संस्करण- 2009&lt;br /&gt;मूल्य- 120 रुपये&lt;br /&gt;प्रकाशक- मनुहार प्रकाशन, महाजन (बीकानेर) ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 51, 0);"&gt; रवि पुरोहित&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रिप्रोग्राफिक्स, पी.डबल्यू.डी.स्टोर के पास,&lt;br /&gt;सदर थाना रोड,&lt;br /&gt;बीकानेर (राजस्थान)-३३४००१&lt;br /&gt;ravipurohit4u@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-3173670125194438256?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/3173670125194438256/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=3173670125194438256' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/3173670125194438256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/3173670125194438256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='म्हारै पांती री चिंतावां : आरसी हरफ़ रै आंगणै'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-5275894337648635453</id><published>2011-04-03T02:05:00.000-07:00</published><updated>2011-04-03T02:16:10.468-07:00</updated><title type='text'>राजस्थानी कहानी</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-d9s7J72EuYE/TZg48VESMII/AAAAAAAAADY/_u72hP3xfx0/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591281546478891138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 86px; CURSOR: hand; HEIGHT: 104px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-d9s7J72EuYE/TZg48VESMII/AAAAAAAAADY/_u72hP3xfx0/s200/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;strong&gt;फ़ुरसत&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;मूल- डॊ. मदन सैनी &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;बासठ वर्षों के बुजुर्ग मघजी अब तक यह नहीं समझ पाए कि जिस बात को वे समझ रहे है, उसे दूसरे लोग क्यों नहीं समझ पा रहे है। नहीं समझते तो मत समझो। उनको क्या फर्क पड़ता है। परन्तु फिर भी यह बात समझने की तो है ही। वैसे मघजी को अपनी गहरी समझ पर पूरा भरोसा है। इस समझ के कई पुख्ता प्रमाण भी है उनके पास। मां-बाप के मोभी पूत मघजी। मघजी के बापू व्यापार का ककहरा भी जानते, जिन्दगी भर सेठों के खेत-खलिहानों में काम करते रहे। कई बार अकाल भी पड़ा, तो घर में चूहों के फाकाकशी की नौबत आ गई। परन्तु मघजी के समझ पकड़ने के बाद घर में कभी तंगी नहीं आई। उनका व्यापार बढ़ने लगा तो निरन्तर बढ़ता ही गया। उनकी मेहनत रंग लाई। समझ के बल पर उनकी कीर्ति के स्तम्भ घर, गांव और गांव से बाहर तक स्थापित हो गए।बड़ी बेटी दुर्गा और मंझले मोहन के जन्म और विवाह की बेला में गांव में जैसा आनन्द-उत्सव हुआ वैसा न तो पहले कभी हुआ और न ही होगा। यदि होगा भी तो उनके ही सबसे छोटे बेटे के विवाह में, जो अभी बाकी है। मघजी के घर में आज कौन है ऎसा जो पहन-ओढकर बाहर निकले, और वाह-वाह न हो। दुर्गा की मां तो सोने से लदकर कनक-कांब जैसी लगती है, तो भला कौन नहीं सराहे। और ये सब गाजे-बाजे किसके भरोसे? निश्चित बात है-मघजी की समझ के बलबूते। फलों-फूलों से हरे-भरे बगीचे की मानिन्द है मघजी का घर-बार और अब तक जिसके बागवान थे खुद मघजी।मघजी को कुछ खबर भी नहीं लगी पर धीरे-धीरे व्यापार वाणिज्य की बागडोर मोहन ने सम्भाल ली। उनको तो तब ध्यान आया जब मोहन ने उनसे विनती की-अब आप साठी पार कर गए हो, यह उम्र आराम करने की है। आप देस जाकर घर-बार सम्भालों, कुछ ध्यान-धूप, पूजा-पाठ में मन लगाओ। बडे-बडे व्यापारियों को सलाह देने वाले मघजी को एकबारगी तो लगा कि उनकी समझ पंगु हो गई है। जिस समझ पर पूरी जिंदगी गुमान किया उनका ही सपूत उसे बिसरा रहा है। मगर मघजी सूझ वाले आदमी थे। सोच-समझकर घर रहना ही ठीक मानकर मंदिर-देवरा, पूजा-पाठ में ध्यान लगाने का मन बना लिया। ऎसा इरादा करना तो आसान था परन्तु इसमें मन लगाकर दिन काटना बहुत मुश्किल था। दिन उगता है तो छिपना मुश्किल और छिप जाए तो उगना कठिन। दिन बीते चाहे रात, मघजी को लगता जैसे युग बीत रहा हो। &lt;br /&gt;&lt;div&gt;"ऎसे तो पार नहीं पड़ेगी दुर्गा की मां।" मघजी ने अपनी पत्नी से कहा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"ऎसे कैसे?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"मंदिरों में घूमने से तो वक्त नहीं निकलता। मोहन ने पता नहीं क्या सोचकर मुझे दुकान से दूर किया है। उस बेवकूफ को कौन समझाए कि हमारे अनुभवों के आगे उसकी नई अक्कल पानी भरती है। सारी जिन्दगी की यही तो असली कमाई है मेरी, और उसने इसकी भी कद्र नहीं जानी।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"नहीं जानी तो मत जानने दो। आप क्यों खुद का खुद जलते हो। मंदिर-देवरों में मन नहीं लगता तो घूम-फिर लिया करो। घर में सिनेटरी का पाखाना क्या हो गया आपको तो धोरे देखे भी युग बीत गया होगा।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"तो तुम भी भला सीख देने लग गई?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"अब इसे सीख समझो तो मेरे पास क्या उपाय है? मैंने तो आपके भले की बात कही है। जब से आपने काम छोड़ा, आपके चेहरे की उदासी मुझसे देखी नहीं जाती।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"ठीक-ठीक..... में अभी जा रहा हूं धोरे.......।" कहकर मघजी मुस्कराते हुए पानी का लोटा लेकर धोरों की ओर चल पड़े। सर्दी के सूरज की तिरछी किरणें रेत की लहरों पर स्त्रेह के हाथ की तरह खिसकती जा रही थी। उन्होंने सोचा-समुद्र और रेत की लहरों में क्या फर्क है? यदि हवा हेत जताए तो दोनों खुश और यदि फंफेड़ने लग जाए तो तूफान का तांडव भी दोनों जगह एक सरीखा। इस धरती की काया में आप-अपना हिस्सा लिए रेत और पानी कितने मनमौजी, कितने आनंदित और कितने स्त्रेही जैसे दोनों को अपनी खूबसूरती का तनिक भी गुमान-गर्व नहीं है। अचानक उनको अपने पांव की अंगुलियों के पास सरसराहट महसूस हुई। नीचे देखा टीटण थी। उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर खासा दूर फेंक दी पर वह तो थोड़ी देर में ही फिर उसी जगह आ पहुंची। मघजी ने तीन-चार बार उसे फेंकी पर वह असली टीटण थी-धोरों धरती का हठीला जीव। हम्मीर ने अपना हठ छोड़ा हो तो यह छोड़े। मघजी तंग आ गए और लोटे का पानी को गटागट पी टीटण को लोटे में छोड़ दिया। फिर उन्होंने टीटण को नजदीक से देखना शुरू कर दिया। अरे! इसका चेहरा-मोहरा तो भंवरे से मेल खाता है। भंवरा इतना चहेता जीव और बेचारी टीटण से कोई बात भी नहीं करता। मघजी ने सोचा यह भंवरा भिनकारे का गीत गाता तितलियों और फूलों के नजदीक जा पहुंचा और कवियों की नजरों में चढ़ गया। परन्तु बेचारी टीटण को कौन पूछे?मघजी के मन में टीटण के साथ हुए अन्याय की बात उठी और उनको लगा जैसे उनके मन में नए ज्ञान का प्रकाश हो गया हो। उन्होंने टीटण को लोटे से लेकर हथेली में रखी। अरे! यह छोटा सा मुंह तो रेल के दानवी इंजन सरीखा लगता है। इसी प्रकार काला-कलूटा और बेरूप, क्या पता किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है कि नहीं। जाकर दुर्गा की मां को बताने से बहुत खुश होगी। उन्होंने टीटण को फिर लोटे में डाला और घर की तरफ रवाना हो गए।दुर्गा की मां माला फेर रही थी। मघजी को देखकर पूछा-"जा आए क्या?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"एक बार माला छोड़, मेरे पास आ.......देख, मैं क्या लाया हूं-रेल का इंजन।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"रेल का इंजन।" कहकर अचंभित करती हुई दुर्गा की मां उठी, "कहां है?" &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मघजी ने दुर्गा की मां की हथेली पकड़कर उस पर लोटा उलटा दिया,"ध्यान से देख...."&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"यह तो टीटण है.......।" इसका क्या चाव-दुर्गा की मां ने हथेली पलटते हुए कहा, हाथ में मूत दिया तो तीन दिन दुर्गन्ध नहीं जाएगी।"मघजी ने नीचे झुककर टीटण को अपनी हथेली पर रखा और उसे दुर्गा की मां के सामने करते हुए कहा, "अरी भागवान....एक बार इसे देख कर बता तो सही, यह कैसी लगती है?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"कैसी क्या लगती है......बाहर फेंको इसे। बुढ़ापे में ये क्या तमाशा कर रहे हो, लोग हंसेंगे। कुछ तो सफेद बालों का कायदा रखो।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"बस-बस, रहने दो। ज्यादा ज्ञान हो गया लगता है। सामने पड़ी चीज ही दिखाई देनी बन्द हो गई है। परन्तु गांव में समझदार लोग मरे नहीं है।" कहते-कहते मघजी ने टीटण फिर लोटे में डाली और तुरन्त बाहर निकल गए।सबसे पहले मुकना दिखाई दिया। मघजी ने उसको आवाज दी, "मुकना.........!""क्या काका....." पीछे देखते हुए मुकने ने पूछा।"ठहरो...देखो मेरे लोटे में क्या है!" पास आते ही उन्होंने लोटा मुकने के मुंह के आगे कर दिया।मुकने ने मंदे पड़ते उजाले में लोटे में झांककर देखा और बोला, "यह तो टीटण है, और क्या?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"टीटण तो है, पर इसका मुंह कैसा है?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"मुंह, इस बेचारी के कैसा मुंह, सपाट और गंदा।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"रेल के इंजन जैसा नहीं लगता?" मघजी ने पूछा। मुकना मुस्कराया, "क्या बात है काका......? तबीयत तो ठीक है ना। कहीं भांग-गांजे की चपेट में नहीं आ गए?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"जा-जा........कुछ देखना नहीं आया तो भांग-गांजे की बात करने लग गया। मैं तो तुम्हें दूसरों की तुलना में ठीक मान रहा था, तुम्हारे तो दिमाग में गोबर भरा है।" कहकर मघजी आगे चल पड़े। मुकने से मिलने के बाद मघजी कई देर तक गांव की गलियों में घूमे, परन्तु उनको किसी पर भी विश्वास नहीं हुआ। फिर कोई उलटा-पुलटा बोलेगा। मास्टर दीनदयाल को छोड़कर दूसरे किसी से बात करनी व्यर्थ है, पर मास्टर जी के घर बेवक्त नहीं जाऊंगा। यह सोचकर मघजी घर आ गए और सूरज ऊगने का इंतजार करने लगे। दिन ऊगा। मघजी ने स्नान वगैरह किया और स्कूल के समय से पहले मास्टर जी के घर जा पहुंचे। मास्टर जी खाट पर बैठे किसी किताब के पन्ने पलट रहे थे। घरवाली पशुओं की सार-सम्भाल करने गई थी। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"जय राम जी की....।" मघजी ने लोटे को हथेलियों के बीच लेकर रामा-सामा की। "आओ मघजी....। आज सूरज किधर से उगा है?" कहते हुए मास्टर दीनदयाल ने किताब एक तरफ रख दी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"क्या बताऊं मास्टर जी........ " मघजी खाट पर बैठते हुए बोले, "गांव में कोई समझदार आदमी ही नहीं है।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"क्यों, क्या बात हुई.....?" &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"किसी को फुरसत ही नहीं है, कोई नई बात सोचने की, कहने की, समझने की। मैं तो कल से एक बात कहने के लिए घूम रहा हूं, पर कोई समझने के लिए तैयार नहीं है....।"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"ऎसी क्या बात है भला....?" मास्टरजी ने हंसकर पूछा। मघजी खुश होते हुए बोले "लोग फूल देखते है। तितलियों पर मोहित होते है, भंवरों के गीत गाते है, पर उनमे नई बात क्या है? केवल देखा-देखी। आप देखो इस टीटण का नया रूप, सबसे बढ़कर नहीं दिखे तो मुझे कहना।" कहकर मघजी ने लोटा मास्टर जी के सामने खाट पर उलटा दिया। एक हल्की सी "तड़" की आवाज के साथ अपने पंजे ऊंचे किए टीटण आ पड़ी। पड़ने के बाद उसके मुंह के "एरियल" और छहों पांव हवा से हाथापाई करते हुए तिरमिर हिल रहे थे। मास्टर जी को मानो करंट लग गया हो, वे उछलकर खड़े हो गए। इस अप्रत्याशित बात को समझने में उनको कुछ समय लगा, फिर गुस्से में बोले, "यह क्या तमाशा है, गांव में तो एक भी समझदार नहीं मिला पर आपकी अक्ल भी घास चरने गई लगती है। ज्ञान छांटने के लिए टीटण ही मिली, मैंने सोचा भले आदमी हो, सुबह-सुबह कोई काम की बात करने पधारे होंगे। अब आप घर पधारो........ नहीं तो लड़के पत्थर मारना शुरू कर देंगे।" मघजी को लगा कि वे पहाड़ के नीचे आ गए है। डगमगाते कदमों से वे कब मास्टरजी के घर से निकले और कब घर पहुंचे, उनको पता ही नहीं चला। घर पहुंचकर वे अपने ओरे में घुस गए। न कुछ कहा न ही सुना। किसी से बात तक नहीं की। उनको पता था कि उनका चेहरा अभी मोर से मिल रहा था, टप-टप आंसू टपकाते मोर से। अन्तत: दुर्गा की मां ने जाकर पूछा "क्या हुआ, आपके कहीं दर्द तो नहीं हो रहा?"&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"दर्द है मेरे सिर में।" मघजी काटते हुए से बोले।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"स्याणों, ऎसे क्या बोल रहे हो?" दुर्गा की मां ने भी आंखे भर ली।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;"मैं समझदार नहीं हूं, दुर्गा की मां....मैं पूरा डफोल, मूर्ख हूं।"मघजी की आंखे छलछला आई। उन्होंने अपनी धोती का पायचा आंखों पर रखकर सुबकना शुरू कर दिया। दुर्गा की मां बोलवा कर रही थी, "हे महाराज बालाजी, यह क्या हो गया बाबा, ऎसे सयाने-समझदार का दिमाग कैसे फिर गया। तुम्हारा जागरण बोलती हूं बाबा इनके आंसू पौंछ दो।" तभी कड़ी बजी। दुर्गा की मां ने पल्ले से आंसू पौंछते हुए मुख्य द्वार पर जाकर देखा, एक लड़का चमचमाता लोटा लिए खड़ा था। बोला, मास्टरजी ने यह लोटा पहुंचाया है। सुबह मघजी उनके घर छोड़ आए थे। मास्टर जी ने कहा है, टीटण नहीं मिली। मिलते ही पहुंचा देंगे। दुर्गा की मां ने झट से लड़के के हाथ से लोटा लिया और दरवाजा बन्द कर कुंडी लगा दी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-5275894337648635453?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/5275894337648635453/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=5275894337648635453' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5275894337648635453'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5275894337648635453'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='राजस्थानी कहानी'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-d9s7J72EuYE/TZg48VESMII/AAAAAAAAADY/_u72hP3xfx0/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-1476429015719026288</id><published>2011-03-27T00:33:00.000-07:00</published><updated>2011-03-27T00:40:29.015-07:00</updated><title type='text'>जान बचाना बन गया जीवन का मकसद</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-_ZwLlz2Ne3s/TY7o_HWCUsI/AAAAAAAAADQ/OnGa8GC8Nos/s1600/bhanwarlalsuthar.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5588660358614241986" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-_ZwLlz2Ne3s/TY7o_HWCUsI/AAAAAAAAADQ/OnGa8GC8Nos/s200/bhanwarlalsuthar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;em&gt;जरा हटके&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;strong&gt;जान बचाना बन गया जीवन का मकसद&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;strong&gt;ज&lt;/strong&gt;हां चाह होती है वहां राह अवश्य मिलती है। बुलंद हौसलों के आगे सारे अभाव बौनेसाबित हो जाते हैं । पंचायत समिति लूणकरनसर के ग्राम खारबारा के निकट चक १एसएलडी निवासी ३७ वर्षीय &lt;strong&gt;भंवरलाल सुथार&lt;/strong&gt; इसका प्रबल प्रमाण है। महज पांचवी तक पढ़े-लिखे भंवर लाल ने खेती बाडी व लकड़ी का काम करते-करते बोरवेलों में गिरे लोगों की जान बचाने वाला एक अनूठा यंत्र खोज निकाला है। समाचार पत्रों में प्रिंस आदि बच्चों के गिरने की खबरों से अन्य लोगों की तरह भंवरलाल सुथार भी चिंतित था इसी बीच छत्तरगढ़ तहसील के लाखनसर गांव में 5नवम्बर 2008 को एक ४ वर्षीय बालक प्रकाश मेघवाल ६५ फीट गहरे कच्चे बोरवेल मेंगिर गया। दुर्घटना की सूचना मिलने पर पुलिस प्रशासन के अधिकारी व समीपवर्ती क्षेत्र के लोग मौके पर पहुंच गए। प्रशासन के साथ आये बचाव कर्मियों ने रस्सीके आगे कपड़ा बांधकर उसमें बच्चे को बैठाकर बाहर निकालने का प्रयास किया मगर असफल रहे। घटना की सूचना मिलने पर भंवर लाल भी मौके पर जा पहुंचा। जहां बच्चेके माता-पिता का विलाप व लोगों के चेहरो पर पसरी उदासी के बीच उसने एक युक्ति सोची। मन में उपजी युक्ति को उसने उपनी अंगुलियों से धोरे पर पसरी रेत पर खींचकर खुद को आश्वस्त किया और प्रशासन की अनुमति से समीपवर्ती मंडी ४६५ आरडी जाकर आधे घण्टे में अपना उपकरण बनाकर फिर घटनास्थल पर पहुंच गया। सुथार के यंत्र से१५ मिनट में बच्चा जिंदा बाहर निकल गया तो लोगों को राहत मिली और भंवरलाल को भीअपने जीवन की एक नई दिशा मिल गई। तत्कालीन जिला कलेक्टर श्रेया गुहा ने गणतंत्र दिवस समारोह पर भंवर लाल को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया तो भंवर लाल ने भी कच्चे पक्के कुएं व बोरवेलों में व्यक्तियों के गिरने से होने वाली अनहोनी केखिलाफ जंग को अपने जीवन का मकसद बना लिया। भंवरलाल का मानना है कि हमारेक्षेत्र की मिट्टी कठोर नहीं है जिससे मशीन की खुदाई से बोरवेल में गिरे व्यक्ति को खतरा हो सकता है। भंवर लाल का उपकरण जीवन यंत्र लोहे की पत्ती सेबना हुआ है जिसमें लगी एक रस्सी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पैरों का कस लेती है वहीं दूसरा मोटा रस्सा उसे बोरवेल से बाहर खींचने के काम आता है। वर्ष २०१०में ११ मार्च को वैशाली नगर, जयपुर में उषा जैन (५२ वर्षीय) १४ इंच के बोरवेलमें गिर गई थी। आपदा प्रबन्धन महकमें के अधिकारियों ने भंवरलाल को मौके परबुलाया तो उसने ३ घण्टे की कड़ी मेहनत के बाद उसके शव को बाहर निकाल दिया।जयपुर जिले के गांव जगतपुरा में एक बच्चा १७० फीट गहरे बोरवेल में उल्टा गिरगया था मगर प्रशासनिक अधिकारियों ने भंवरलाल सुथार को वहां बुलाकर भी अपनेयंत्र के प्रयोग की अनुमति नहीं दी। इसी प्रकार टोंक के जहाजपुरा गांव में २२फीट गहरे बोरवेल में गिरे बच्चे की सूचना मिली मगर प्रशासन भंवरलाल को उनकेमशीन सहित वहां पहुंचाने के लिए गाड़ी उपलब्ध नहीं करवा पाया। इन दिनों भंवरलाल ने एक अन्य यंत्र तैयार किया है जो बोरवेल में बीच में फंसे हुए व्यक्ति को निकालने में कारगर है। पौने इंच के पाइप व एक रस्सी की सहायता से बना यह यंत्रबीच में फंसे व्यक्ति के पास जाकर एल का आकर ग्रहण कर लेता है जिसकी सहायता से७०-८० किलो तक वजन के व्यक्ति को बाहर निकाला जा सकता है।धुन के धनी भंवरलाल ने भले ही कुएं और बोरवेलों से होने वाली अनहोनी से लोगोंको बचाने का मिशन बना रखा हो मगर प्रशासन ने कभी उसकी मदद की पहल नहीं की है।उसके यंत्र को सुधारने के लिए उसे कभी कोई सहयोग उपलब्ध नहीं करवाया गया है ।कई बार दुर्घटना की सूचना के बावजूद प्रशासन उसको घटनास्थल तक लाने ले जाने केलिए वाहन उपलब्ध नहीं करवा पाता है। -मदन गोपाल लढ़ा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-1476429015719026288?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/1476429015719026288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=1476429015719026288' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/1476429015719026288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/1476429015719026288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='जान बचाना बन गया जीवन का मकसद'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-_ZwLlz2Ne3s/TY7o_HWCUsI/AAAAAAAAADQ/OnGa8GC8Nos/s72-c/bhanwarlalsuthar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-6486614928288322796</id><published>2010-11-24T19:52:00.000-08:00</published><updated>2010-11-24T19:56:31.536-08:00</updated><title type='text'>लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TO3du2ZM-hI/AAAAAAAAAC8/faAoHTdw7bg/s1600/nrs.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5543330513307892242" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 124px; CURSOR: hand; HEIGHT: 166px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TO3du2ZM-hI/AAAAAAAAAC8/faAoHTdw7bg/s200/nrs.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;strong&gt;लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;धुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे. 21 जुलाई1918 को खारी में जन्मे नानूराम संस्कर्ता ने जीवन पर्यन्त गांव में रहकर साहित्य-साधना की. उनकीरचनाएं ग्रामीण जिन्दगी के सुख-दुख तथा आकांक्षा व अवरोधों का प्रामाणिक दस्तावेज है.देहात की दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा होगा , जो उनकी पारखी निगाहों से छूट गया हो.यह उनका अनुभव किया हुआ सच है, जो बिना किसी लाग-लपेट उनकी कलम से प्रगट हुआ है.अपने रचना संसार की तरह उनका व्यक्तिगत जीवन भी निर्मल एवं सरल रहा.शहरी जीवन की भाग-दौङ उनको कभी रासनहीं आई.बीकानेर जिले के काळू गांव में रहते हुए उन्होंने शिक्षा वसाहित्य की सेवा में अपन जीवन समर्पित कर दिया.राजस्थानी में 11 काव्य कृतियों, 7 कथा संग्रह तथा हिन्दी में 5 कवितासंग्रह , 3 कहानी संग्रह व 2 शोध ग्रन्थो के रूप मे उनकी सहित्यिक विरासत अत्यन्त समृद्‍ध है. उनका शोध ग्रन्ध ‘राजस्थान का लोक साहित्य’ बेजोङहै. ‘कळायण’ राजस्थानी प्रकृति काव्य में सिरमोर रचना है. उनका ‘ग्योही’ कथासंग्रह राजस्थानी कहानी की यात्रा में मील का पत्थर माना जाता है.काळू में 25 नवम्बर 2004 को अपनी आत्मा से पदार्थ उतार देने वाले मनीषी साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता का पुण्य-स्मरण करते हुए प्रस्तुत है उनकी एक कविता-&lt;br /&gt;‘आज हरिया खेतां में छांवलो आवै&lt;br /&gt;आभै लील गलै, वदळां री नौका कुण चलावै?&lt;br /&gt;आज भंवरा फूलां नीं बैठै; थांरी जोत किरणां में&lt;br /&gt;मतवाळा ऊंचा उडै चढै!&lt;br /&gt;चातकङा रा जोङा, सरिता रै सारै कियां भेळा होर्या है?&lt;br /&gt;साथीङां आज म्हैं घरै नीं जावूंला&lt;br /&gt;आज म्हैं आभै झाङ, विश्व विभव लूंटणो चावूं.&lt;br /&gt;आज समदरियै री उछाळ में झाग वणावूं;&lt;br /&gt;झंझवात-हरखीली हंसी हंसै!&lt;br /&gt;आज बेवजै मुरली वाजै-सारो दिन म्हैं वै में ही लगावूंला!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मदन गोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-6486614928288322796?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/6486614928288322796/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=6486614928288322796' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/6486614928288322796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/6486614928288322796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html' title='लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TO3du2ZM-hI/AAAAAAAAAC8/faAoHTdw7bg/s72-c/nrs.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-5425401081700816213</id><published>2010-10-31T00:42:00.000-07:00</published><updated>2010-10-31T00:51:23.456-07:00</updated><title type='text'>मेहंदी, कनेर और गुलाब</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TM0fM3rgPFI/AAAAAAAAACk/O7MfWPwz4DU/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5534113823073516626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 91px; CURSOR: hand; HEIGHT: 124px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TM0fM3rgPFI/AAAAAAAAACk/O7MfWPwz4DU/s200/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; राजस्थानी कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मेहंदी, कनेर और गुलाब&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मूल- श्रीलाल नथमल जोशी                                           अनुवाद- मदन गोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हमारे नए मकान में पौधों की दो क्यारियां हैं। वैसे तो मकान बने बीस वर्षो से अधिक समय हो गया, पर दूसरा मकान उससे भी पुराना है, इसी कारण दोनो का भेद बताने के लिए "नए" शब्द का प्रयोग किया है। एक रात मैं घर में अकेला था और आधी रात में मेरी नींद उचट गई। मैं छत से नीचे आया और दरवाजा खोलकर दो-चार मिनट गली में खड़ा रहा। दरवाजा बंद करके जब वापस लौटा तब लगा कि मेरे कानों में एक अद्भुत शक्ति पैदा हो गई है। ऎसा लगा कि मैं पेड़-पौधों की बोली समझने लगा हूं। मैंने वहीं पांव रोप दिए। यदि आहट हुई, तो वार्तालाप रूक जाएगा। कनेर ने मेहंदी से शिकायत की-"देख मेहंदी, तुम्हारी उम्र बीस वर्ष है। तुमने अपनी जिन्दगी के अठारह वर्ष व्यर्थ गंवाए हैं। तुम अब तक नहीं जान पाई कि प्रेम क्या चीज होती है।"मेहंदी-"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं।""दो वर्ष पहले जब मैं यहां आया था" कनेर बोला, "तब मैंने तुमको पारस्परिक प्रेम के सुख का अनुभव कराया।" मेहंदी बोली-"मैं तुम्हारा गुण मानती हूं।" "पर तू गुण भूल गई मेहंदी।" कनेर बोला। "तुम्हारा ध्यान अब मुझमें नहीं रहा।" "यह बात भी ठीक है।" मेहंदी ने कबूल किया। "पर यह कितनी बुरी बात है, मेरी रानी। वह रात याद कर जब तुमने मुझे अपने ±दय का राजा बनाया और वचन दिया कि मेरे सिवाय अब और कोई कभी तुम्हारे  दय में आसन नहीं पाएगा। क्यों मेरी बात ठीक है ना?"मेहंदी ने कहा-"ठीक को तो ठीक ही कहना पड़ेगा।" "यदि मेरी बात ठीक है तो फिर तुम्हारा आचरण...." कनेर ने लांछन लगाया। मेहंदी बोली-"तू जोर से मत बोल। लोग सुनेंगे तो नाहक हमारी बदनामी होगी। तुम्हारे ऊंचे सुर से ऎसा मालूम पड़ता है कि तुम अब मुझे प्यार नहीं करते। अगर प्यार करते तो तुम्हारी बोली मधुर होती। प्यार की बोली कभी कड़वी नहीं होती।""मैं माफी चाहता हूं कि मुझे जोश आ गया, पर तुम्हारी सफाई भी तो मैं सुनना चाहता हूं।" "स्त्री का धर्म ही चुप रहना, बरदाश्त करना है। मेरा बोलना तुम्हे अच्छा नहीं लगेगा, इस कारण मेरा नहीं बोलना ही ठीक रहेगा।" कनेर ने अपना सुर संयत किया और मन में तसल्ली करली कि बगल में गुलाब गहरी नींद में है। फिर बोला-"तुम्हारे धीरज का तो मैं शुरू से ही प्रशंसक हूं, फिर भी मेरे प्रति तुम्हारी उदासीनता समझ में नहीं आती।" मेहंदी ने कहा-"अगर बोलूंगी तो तुम्हें दुख होगा, इससे अच्छा है कि तुम मुझे चुप ही रहने दो।" थोड़ी देर सन्नाटा रहा फिर मेहंदी बोली-"जब तुम यहां आए थे, तुम्हारी रग-रग जीवट से फड़कती थी और तुमने मुझसे बिना पूछे ही मेरा आलिंगन कर लिया। तुम्हारी यह हरकत उचित तो नहीं थी, पर एकांत देखकर युवक या युवती उसका लाभ उठाते ही हैं, यह सोचकर मैं चुप रह गई। दूसरी बात यह भी है कि तुम्हारे स्पर्श से मेरी वर्षों से सोई नसों में जीवन का संचार होने लगा।" "मुझे खुशी है कि तुम सच्ची और ईमानदार हो।" " परन्तु कनेर। मेरे दुर्भाग्य से तुम्हारा विकास नहीं हुआ। शायद यह भूमि तुम्हारे अनुकूल नहीं रही। यहां आने के बाद तुम लम्बाई में तो बढ़े पर सघन नहीं हुए, तना पतला रह गया। नतीजा यह हुआ कि जवानी में ही तुम्हारी कमर बूढ़ों से अधिक झुक गई। खुद का भार वहन करना भी तुम्हारे लिए भारी हो गया और तुम मेरे सहारे रहने लगे। बुरा मत मानना कनेर। सच प्राय: कड़वा होता है।" कनेर की वाणी में उदासी तो आ गई पर वह बोला-"तुम अपनी बात चालू रखो।" गुलाब की डाली हिलती देख कर मेहन्दी चुप हो गई। फिर बोली-"कहीं हम गुलाब की नींद खराब नहीं कर दें। हमें अब चुप रहना चाहिए।" "तुम्हारी मरजी अगर तुम बात नहीं करना चाहोगी तो मैं जबरदस्ती तुम्हें बोलाने से रहा।" मेहंदी ने कहा-"मैं तुम्हारा भार दिन-रात वहन करती हूं पर फिर भी मैंने तुम्हें अलग करने की चेष्टा नहीं की। जब मैंने तुमको अपना लिया तो प्रेम निभाना मैं अपना फर्ज समझती हूं।" "तुम सच कहती हो मेहंदी?" कनेर ने तपाक-से पूछा। "मगर कनेर।" मेहंदी बोलती गई, "मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरी उमंग में बाधक बनो।" "मैंने कौनसी बाधा डाली है भला।" कनेर बोला। "गुलाब से मेरा सम्पर्क तुमको अच्छा लगता है?" मेहंदी ने पूछा। कनेर से कहा-"यह भी कोई पूछने की बात है? इसका जवाब तुम अच्छी तरह जानती हो।" "मैं सोचती हूं तुमको यह पसंद नहीं है। तुम जवानी में ही बूढ़ा गए, मेरे सहारे दिन काट रहे हो, काटो, तुम्हें इनकार नहीं, पर जब मेरी खुशी तुम्हें अखरती है तब कैसे पार पड़ेगी? जब यहां हम दो थे तब तुमने पहल की और मैंने स्वीकार। अगर तुम कुछ लायक होते और मेरे बर्ताव में फर्क आ जाता तब भी तुम मुझे कहने के हकदार होते। मगर तुमसे राम रूठ गया और मेरे भाग से गुलाब यहां आ गया।" "मेहंदी। मुझे दुख इसी बात का है कि मेरे निर्दोष रूप-व्यवहार के बाद भी कांटों वाला गुलाब तुम्हारे चित्त चढ़ गया।" मुझे खांसी आने वाली थी, पर मैंने खांसी एकदम रोक ली। मुझे याद नहीं कि मेरा सांस भी उस वक्त रूका हुआ था या चालू, कारण मुझे डर था कि कहीं मेरी थोड़ी-सी आहट भी इस वार्तालाप को बन्द कर सकती है। मेहंदी ने कहा-"कनेर। नाराज मत होना। अपने गुण पहाड़ जैसे व दूसरों के तिल जैसे लगना आम बात है। तुम्हें अपनी कूब नहीं दिखती है, गुलाब के कांटे नजर आते हैं। शायद तुमको पता नहीं कि उसके हरेक कांटे में पुष्प और पत्ते समाए हुए हैं। जिस गुलाब के पड़ोस से वातावरण महकता है उसमें कोई नई बात नहीं है पर जिस मिट्टी में वह उगता है वह भी सौरभ से धन्य होने लगती है। जो लड़कियां समझदार होती हैं वे लड़कों के रूप-रंग से ज्यादा उनके गुणों पर ध्यान देती हैं।" मेरे कान चोटी तक खड़े हुए-अरे। ये पेड़-पौधे भी आपस में लड़के-लड़कियों की बातें करते है। मेहंदी ने बात चालू रखी-"गुलाब की छुअन मेरे पत्तों को बेध देती है, पर उसके यौवन व गुणों के कारण यह हरकत भी मुझे प्रिय लगती है। मेरा एक-एक पत्ता उससे संसर्ग करके बिंधने के लिए तैयार है-उसमें ओज है, उसकी गंध में मादकता, मिठास है, उसके फूलों में रस है, रूप है। कमी क्या है, मैं नहीं जानती। अगर तुम समझा सको तो मेरे दिमाग के दरवाजे खुले है।" कनेर कुछ नहीं बोला। मेहंदी ने कहा-"कनेर मुझे दुख है कि मेरे मुंह से ऎसी कई बातें निकल गई जो तुम्हें बुरी लगी होगी। इसी कारण मैं बोलना नहीं चाहती थी, पर जब वाद छिड़ जाता है तो बोलों पर काबू नहीं रहता। मैं अब भी तुम्हें विश्वास दिलाना चाहती हूं कि गुलाब से मेरे सम्पर्क का मतलब तुम्हारा तिरस्कार नहीं है।" एकाएक गुलाब की एक कली चटकी और हवा में महक पसर गई। गुलाब की हरकतों से ऎसा लगा कि वह जाग रहा था और नींद का दिखावा कर रहा था। मेहंदी जब चुप हो गई तब गुलाब बोला-"कनेर, मुझे लग रहा है कि मेरे आने से एक गृहस्थी की सुख-शांति में विघA पड़ गया। मैं यहां आ तो गया हूं, पर यहां से जाना मेरे हाथ में नहीं है। मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे रहने से तुम्हें कष्ट हो। मेरे लिए एक ही धर्म है-सुख-शांति की यथास्थिति में छेड़छाड़ नहीं करना। तुम्हारी आत्मा को ठेस पहुंचाऊं तो मेरा जीना बेकार है। इससे तो अच्छा यही होगा कि मैं तुम्हारे लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दूं। यहां से जाना तो मेरे बस में नहीं पर अनशन करके सूख जाना तो मेरे हाथ में है। फिर तुम दोनों चैन से रहना।" मेहंदी की काया कांप गई। उसकी रग-रग गुलाब की इस भविष्यवाणी से रोने लग गई। कनेर भी थर-थर कांपने लगा। बोला-"गुलाब तुम संत हो। मैं अब तक तुमको महज कामुक मानता था। वास्तव में मेरे जीवन में अब कुछ शेष नहीं रहा। शायद कल तक बागवान आएगा और मुझे उखाड़ कर गली में फेंक देगा। मेरी दुआ है कि तुम दोनों फलो-फूलो।" मैं छत पर गया और सो गया। मेरे कानों में आवाज गूंजती रही-तुम दोनों फलो-फूलो.... इसके बाद कई बार मैंने पौधों की बातचीत सुनने की कोशिश की पर घंटे-दो-घंटे इंतजार के बाद भी कभी एक फुसफुसाहट की भनक तक कान में नहीं पड़ी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-5425401081700816213?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/5425401081700816213/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=5425401081700816213' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5425401081700816213'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5425401081700816213'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='मेहंदी, कनेर और गुलाब'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/TM0fM3rgPFI/AAAAAAAAACk/O7MfWPwz4DU/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-923999825470537374</id><published>2010-06-02T04:48:00.000-07:00</published><updated>2010-06-03T05:07:38.147-07:00</updated><title type='text'>मातृभाषा राजस्थानी हो प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;"&gt;मातृभाषा राजस्थानी हो प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा -&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मातृभाषा राजस्थानी को प्रदेश के जन मन ने तो कलेजे में बसाया है लेकिन सत्ता के गलियारों में मायड़ का ‘हेला’ सदैव अनसुना रहा है। राजनीतिक उदासीनता के कारण ही आठ करोड़ लोगों की जबान अपने वाजिब हक के लिए तरस रही है। इधर शिक्षा का अधिकार कानून ने शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। इस कानून के २९ वें अनुच्छेद में स्पष्ठ प्रावधान है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा का अवसर दिया जाए। शिक्षाविदों की भी राय है कि मातृभाषा में तीव्र गति से सीखता है।&lt;br /&gt;राजनीतिक उपेक्षा के कारण मायड़ भाषा की संवैधानिक मान्यता का संकल्प 6 सालों से दिल्ली में धूल फांक रहा है तो राजस्थानी भाषा, साहित्य व संस्कृति अकादमी सहित प्रदेश की समस्त अकादमियां अध्यक्ष के अभाव में ठप पड़ी है।&lt;br /&gt;तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भाषा की नदी का प्रवाह जारी है। लोक साहित्य की समृद्ध विरासत के रूप में परम्परागत ज्ञान को संचित करने के साथ राजस्थानी ने नए जमाने की बयार को खुले मन से अपनाया है तथा तकनीक की दुनिया में अपने पांव पसारे है। वेबपत्रिका नेगचार, जनवाणी परलीका, आपंणो राजस्थान ओळखाण, राजस्थली, आपणी भासा आपणी बात, मनवार, धरती धोरा री सरीखी दर्जनों वेबपत्रिकाओं के अलावा राजस्थानी साहित्यकारों के सैंकड़ों निजी ब्लॉग अन्तर्जाल के आँगन में राजस्थानी रंग बिखेर रहे हैं। यू-ट्यूब, फेसबुक व मीडिया क्लब जैसे इंटरनेट के जन मंचों पर भी राजस्थानी की धमक दुनिया भर के लोगों को अपनी समृद्धता से चमत्कृत कर रही हैं।&lt;br /&gt;अब सवाल भाषा का नहीं वजूद का है। जब चीन व देश के गुजरात , महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश जैसे राज्य अपनी क्षेत्रीय भाषा के बलबूते बुलंदी के शिखर को छू सकते हैं फिर हमारी मातृभाषा पर अविश्वास क्यों ? रामस्वरूप किसान के शब्दों में "हुवै नहीं जिण देसड़ै मा भाषा रो मान, के पावे बो देसड़ो पर-देसां सम्मान।"&lt;br /&gt;मायड़ भाषा राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता का मुद्दा राजनीति के गलियारों में उलझ कर रह गया है। गत साठ वर्षों से गांधीवादी तरीके से चल रहे शांतिपूर्ण जन आंदोलन के प्रतिफल के रुप में थोथे आश्वासनों के अलावा कुछ भी नहीं मिला है जिससे अब राजस्थानी मोट्यारों का धैर्य जबाब देने लगा है। गौरतलब है कि अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने ही 25 अगस्त 2003 को प्रदेश की विधानसभा से राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प पारित कर केन्द्र को भिजवाया था। अब केन्द्र व राज्य दोनों में कांग्रेस सत्तारूढ़ है। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री संसद के अन्दर व बाहर कई मर्तबा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता का प्रस्ताव रखने का भरोसा दिला चुके है। प्रदेश की जनता उस दिन का बेसब्री से इन्तजार कर जब उनकी जबान पर लगा ताला खुल जाएगा व राजस्थान की मायड़ भाषा को देष की 22 अन्य भाषाओं की तरह भारतीय संविधान में बराबरी का दर्जा हासिल होगा।&lt;br /&gt;अपने पुरातन साहित्य, समृद्ध व्याकरण, वृहत शब्दकोश एवं राजस्थानी भाषी विशाल जनसमुदाय के कारण राजस्थानी पूर्ण रूप से एक वैज्ञानिक भाषा है। भाषा-भाषियां की दृष्टि से राजस्थानी का भारतीय भाषाओं में सातवाँ तथा विश्व भाषाओं में सोलहवाँ स्थान है। राजस्थान के अलावा गुजरात, पंजाब, हरियाणा व मध्यप्रदेष के सीमावर्ती क्षेत्र के लोग रोजमर्रा की जिन्दगी में राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते है। पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में राजस्थानी सहजता से बोली-समझी जाती है। वहाँ राजस्थानी भाषा से नाता रखने वाली कई संस्थाएँ भी सक्रिय है। वर्ष 1994 में पाकिस्तान के राजस्थानी लेखकों एक दल जोधपुर से प्रकाषित ’माणक‘ पत्रिका के कार्यालय आया। राजस्थानी लोक साहित्य की विशाल सम्पदा है जिसमें यहाँ के लोकाचार, इतिहास, संस्कार व राग-रंग की थाती सुरक्षित है। ’ढोला मारू रा दूहा‘ तथा ’वेली क्रिसण रूकमणी री‘ जैसी उत्कृष्ट कृतियों की रचना राजस्थानी में हुई है। जिस भाषा में 20 हजार प्रकाषित ग्रंथ तथा तीन लाख से अधिक हस्तलिखित पांडुलिपियां मौजूद है। आठवीं सदी के ऐतिहासिक साक्ष्यों में जिसकी चर्चा मिलती है। जार्ज ग्रियर्सन, डा. एल. पी. टेस्सीटोरी, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विद्वानों ने बगैर किसी विवाद के जिसे समर्थ भाषा स्वीकार किया है, उस भाषा को मान्यता के लिए 63 वर्षों का इन्तजार हमारे समय की एक विडम्बना नहीं तो भला क्या है?&lt;br /&gt;राजस्थानी स्वतंत्र व समर्थ भाषा है। जब यहां के लोग हिन्दी को प्रथम राजभाषा स्वीकार करते हुए द्वितीय राजभाषा के रूप में अपनी मायड़ भाषा की मांग करते है तो भला ऐतराज क्यों ? जबकि हिन्दी भाषी हरियाणा में पंजाबी व दिल्ली में पंजाबी व उर्दू को संयुक्त रूप से द्वितीय भाषा का दर्जा दिया गया है। गांधीजी से लेकर तमाम बड़े विद्वानों ने प्रारंभिक शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा की पैरवी की है। जब प्रदेश में उर्दू, सिंधी व पंजाबी माध्यम के 1195 विद्यालय चल रहे हैं फिर राजस्थानी माध्यम में टालमटोल क्यों ?&lt;br /&gt;संसार की समस्त भाषाओं की अपनी बोलियां है, जो उसकी समृद्धि की सूचक मानी जाती है। जिस तरह अवधी, बघेली, छतीससगढी, ब्रज, बांगरू, कन्नोजी, बुंदेली व खड़ी बोली का समूह हिन्दी की धरोहर है वैसे ही वागडी, ढूंढाणी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी आदि बोलियां राजस्थानी का गौरव बढ़ाती है। बोलियों की विविधता के बावजूद राजस्थानी का एक मानक स्वरूप तय है जो पूरे प्रदेष में सहज स्वीकृत है, जो ग्यारहवीं से लेकर एम.ए. तक एच्छिक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।&lt;br /&gt;राजस्थानी जीवंत भाषा है। भक्ति, ज्ञान, श्रृंगार व वीरता से परिपूर्ण राजस्थानी साहित्य में हमारे देश के एक हजार वर्षो के राजनैतिक-सांस्कृतिक-धार्मिक अतीत के साक्ष्य सुरक्षित है। जैन धर्म के मनीषी साधुओं ने अपनी ज्ञान राशि को राजस्थानी भाषा में रचित ग्रन्थों में संजोया है। महाराणा प्रताप, रामदेवजी, तेजाजी, करणी माता, गोगाजी, जाम्भोजी, जसनाथ जी, मीराबाई, आचार्य तुलसी, जैसे भक्तों- शूरों की मातृभाषा राजस्थानी ही है। केन्द्रीय साहित्य अकादमी राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा मानते हुए प्रतिवर्ष श्रेष्ठ पुस्तकों पर पुरस्कार देती है। राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी राजस्थान सरकार द्वारा स्थापित स्वायत्त संस्था है। राजस्थानी में दर्जनों पत्रिकाएँ नियमित प्रकाशित होती है। राजस्थानी संगीत की कर्णप्रिय धुनें सात समन्दर पार भी सुनी जाती है। राजस्थानी सिनेमा भी धीरे-धीरे अपना प्रभाव जमा रहा है। राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश के दर्जनों विश्वविद्यालयों में राजस्थानी साहित्य पर शोध कार्य हुए है तथा आज भी शोधार्थी राजस्थानी साहित्य सम्पदा से हरदम कुछ नया प्राप्त करते है।&lt;br /&gt;अब समय आ गया है कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर व शिक्षा का माध्यम बनाकर करोडों लोगों की भावनाओं का सम्मान किया जाए। राजस्थानी राजस्थान की तो अस्मिता है ही, देश का भी गौरव है।  महाकवि कन्हैयालाल सेठिया के शब्दों में कहें तो राजस्थानी रै बिना क्यारों राजस्थान।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-923999825470537374?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/923999825470537374/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=923999825470537374' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/923999825470537374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/923999825470537374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='मातृभाषा राजस्थानी हो प्रारंभिक शिक्षा का माध्यम'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-4684388119962491605</id><published>2010-04-05T10:13:00.000-07:00</published><updated>2010-05-12T06:55:40.567-07:00</updated><title type='text'>चट्टानों की होड़ करते हौंसले</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S7oa6SxlFeI/AAAAAAAAABo/1X4rk8zLkDM/s1600/DSCN1179.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5456703487287301602" style="margin: 0px auto 10px; display: block; width: 200px; height: 150px; text-align: center;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S7oa6SxlFeI/AAAAAAAAABo/1X4rk8zLkDM/s200/DSCN1179.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(255, 102, 102);"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;चट्टानों की होड़ करते हौंसले&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center; color: rgb(0, 153, 0);"&gt;&lt;strong&gt;मदन गोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;                   कि&lt;/span&gt;सी ने सच ही कहा है कि हौंसले फ़तह की बुनियाद हुआ करते हैं. बीकानेर जिले के सूंई ग्राम का शिशुपाल सिंह इसकी मिसाल है. बुलंद हौंसलों के धनी शिशुपाल सिंह ने अपने जीवन से आदमी के जीवट को नई परिभाषा दी है. वर्षों पूर्व एक हादसे में रीढ़ की हड्डी टूट जाने के बावजूद उसने अपने मजबूत इरादों को नहीं टूटने दिया. वाकई उसकी जिन्दादिली को सजदा करने को जी करता है.&lt;br /&gt;            उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच महाजन से २५ किमी दूर बसे सूंई ग्राम का बासिन्दा शिशुपाल सिंह भरी जवानी में एक खतरनाक हादसे का शिकार हो गया. बीस वर्षों पुरानी बात रही होगीं. गांव मे बिजली चली गई. दो दिनों तक नहीं आई. बिजली महकमे के इकलौते कर्मचारी के भरोसे दस गांवों की बिजली व्यवस्था का जिम्मा था. एसी स्थिती में गांव के लोग ही फ़्यूज वगैरह डाल कर काम चलाते थे. जब दो दिनों तक विभाग का कोई आदमी बिजली की सुध लेने नहीं आया तो ग्रामीणों के कहने पर शिशुपाल सिंह फ़्यूज लगाने के लिए ट्रांसमीटर पर चढ़ा लेकिन करंट के जोरदार झटके से वह जमीन पर गिर पड़ा व उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई. अब शिशुपाल सिंह की उम्र ६५ वर्ष की है. बीते बीस वर्षों से वह लकडी की खाट पर सीधा लेटा है. खुद करवट बदलना भी संभव नहीं है. यद्यपि इस दुर्घटना ने उसके शरीर को अपंग बना दिया लेकिन उसके विचार अटल-अडिग है.&lt;br /&gt;            खाट पर लेटे-लेटे ही शिशुपाल सिंह ने जीने का एसा मकसद तलाश लिया है जो भले चंगे लोग भी नहीं तलाश पाते. शिशुपाल सिंह ने अपने पास एक लाउडस्पीकर मंगा रखा है जिससे वह रोजाना पूरे गांव को अखबार बांच कर सुनाता है. साधन- सुविधाओं से वंचित इस गांव में ४-५ घरों में अखबार आता है, वह भी ११ बजे आने वाली इकलौती बस में, मगर शिशुपाल सिंह के प्रयासों से पूरा गांव देश-दुनिया की सुर्खियां जान जाता है. तभी तो लोग इस अनोखे समाचार-वाचक के न्यूज बुलेटिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं. इतना ही नहीं किसी के घर जागरण हो या किसी का पशु खो जाए, गांव वालों को इसकी सूचना शिशुपाल सिंह के जरिये ही पहुंचती है. ग्राम में ग्रामसेवक या पटवारी या टीकाकरण के लिये नर्स के आने की खबर भी शिशुपाल सिंह के रेडियो से ही प्रसारित होती है.&lt;br /&gt;             हालांकि शिशुपाल सिंह के लिए चलना-फ़िरना तो दूर खुद करवट बदलना भी मुम्किन नहीं, मगर उसके चेहरे पर दैन्यता की छाया तक नहीं दिखती है. उसका बात-बात पर खिलखिला कर हंसना तथा चेहरे का चमकता ओज उसके चट्टानों सरीखे हौंसलों को बयां करते जान पड़ते हैं &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आलेख- मदन गोपाल लढ़ा&lt;br /&gt;छाया- लूणाराम वर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-4684388119962491605?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/4684388119962491605/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=4684388119962491605' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/4684388119962491605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/4684388119962491605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='चट्टानों की होड़ करते हौंसले'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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/&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;डा. मदन गोपाल लढ़ा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S6ekUzj_W5I/AAAAAAAAABg/AjbDfkTtAbI/s1600-h/P1010731.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451506551300774802" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 200px; height: 150px;" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S6ekUzj_W5I/AAAAAAAAABg/AjbDfkTtAbI/s200/P1010731.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;गत दिनों अखबार के पहले पन्ने पर ‘अब नहीं दिखेंगे सडक़ पर जुगाड़’ खबर पढ कर झटका-सा लगा। मुश्किल यह है कि यह माननीय न्यायालय का फैसला है, जिस पर कुछ भी बोला जाना अनुचित है। मगर इस खबर ने मेरे जैसे कलम घिस्सुओं के मन में हजारों सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। जुगाड़ से ही तो देश चल रहा है। क्या जुगाड़ पर प्रतिबन्ध किसी भी कोने से उचित है? खैर उचित-अनुचित की छोडि़ए, मुझे तो यह असंभव-सा लगता है। हालांकि कानूनन जुगाड़ पहले से ही अवैध है। लेकिन भला हो हमारी पुलिस का जो देश के हित में इस कानून को ठंडे बस्ते में डालकर आँख बंद किए है। यह कोई आसान काम नहीं है। मुझे तो लगता है कि हमारी पुलिस सही अर्थों में गांधीवादी है, जो न तो बुरा देखने में यकीन करती है न ही बुरा सुनने में। अलबत्ता बुरा कहने के मामले में थोड़ी छूट लेती है जो समय की जरूरत भी है। तभी तो आए दिन जुगाड़ से होने वाले सडक़ हादसे पुलिस की निगाह में नहीं आते न ही हताहतों की चीख पुकार पुलिस को सुनाई देती है। रही बात कहने की, सो पुलिस की मर्जी हो तो बीस क्विंटल चारे से भरे जुगाड़ को बेरोकटोक जाने दे और जो मर्जी हो तो सीट बेल्ट नहीं लगाने पर आपका चालान काटकर डांट पिलादे।&lt;br /&gt;अब बात जुगाड़ की। जीवन का ऐसा कौन सा क्षेत्र होगा जहाँ जुगाड़ की जरूरत न हो। जो जितना बड़ा जुगाड़ु वह उतना ही सफल। अब राजनीति को ही लीजिए। हमारे नेताओं की जुगत विद्या में पारंगतता की क्या होड़ । टिकट के जुगाड़ से शुरू हुआ राजनीति का सफर जुगाड़ के सहारे ही मंजिल तक पहुंचता है। वोट का जुगाड़ हो या पद का, पैसे का जुगाड़ हो या साधन-सुविधाओं का, राजनीति के अखाड़े में तो बिन जुगाड़ सब सूना-सूना है। इन दिनों तो सरकार बनाना भी जुगाड़ की करामात हो गया है। करोड़ों लोगों के चहेते अभिनेताओं के लिए सुन्दर नाक-नक्स व मधुर आवाज से कहीं बड़ी योग्यता जुगाड़ु होना है। अब वो जमाना गया जब आपकी शक्ल सूरत पर रीझकर कोई निर्माता-निर्देशक आपको अपनी फिल्म में मौका देकर ‘ब्रेक’ दे देता। निरी योग्यता के बलबूते तो आजकल बॉलीवुड में ‘क्लैप बॉय’ भी नहीं बना जा सकता। अलबत्ता किसी मुख्यमंत्री का बेटा, हॉटलों का मालिक अथवा अंडरवल्र्ड के डॉन की पर्ची हो तो बड़े पर्दे के दरवाजे आपके लिए खुले हैं। अभिनय ही नहीं गीत-संगीत में भी जुगत भिड़ाकर ही कोई जगह बना सकता है। आपकी सुविधा के लिए ‘रियलिटी शो’ के नाम पर जुगाड़ का हुनर दिखाने के बाकायदा मंच तैयार हो गए हैं। सरकारी नौकरी में जुगाड़ कला के जानकार के वारे ही न्यारे होते हैं। प्रमोशन पाना है, चाहे मन माफिक सीट, जुगाड़ तो बिठाना ही होगा। अफसर को पटाने के लिए उसकी बीवी की वक्त-बेवक्त की प्रशंसा व नित नए उपहारों से खुश रखना जुगाड़ कला के ही तो पैतरें है। धर्म जैसा क्षेत्र भी जुगाड़ के प्रभाव से अछूता नहीं रहा। घरबार छोड़ कर बाबा तो बन गए मगर जुगत विद्या छोडऩे से काम नहीं चलेगा। किसी टीवी चैनल पर प्रवचन नहीं आए तो भला बाबा कैसे ? प्रवचन के लिए लम्बे-चौडे शामियाने, भारी भीड़ , बड़े-बड़े हॉर्डिंग्स व मीडिया की मौजूदगी जुगाड़ का ही तो जादू है। साहित्य के संसार में भी जुगाड़ का महत्व कम नहीं है। साहित्य अकादमियों की सदस्यता हो चाहे साहित्यिक पुरस्कार, बिना जुगाड़ दुर्लभ ही समझिए।&lt;br /&gt;अब बचा घर। सो घर ढंग चलाने के लिए भी जुगाड़ कला में दक्षता जरूरी है। मंहगाई के इस जमाने में भला कलम घिसकर या कोई छोटा-मोटा काम करके घर चल सकता है? घर बनाना हो या बेटी का विवाह करना हो, कर्जे का जुगाड़ करना ही पडता है। मेरे जैसों के महीने का आखिरी सप्ताह इधर-उधर से जुगाड़ करके ही बीतता है।&lt;br /&gt;मेरा मानना है कि जुगत विद्या को सातवें वेदांग का दर्जा देकर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल कर देना चाहिए ताकि इसे सरलता से सीखा जा सके । आप भी तो जुगाड़ के महात्म्य से अनजान नहीं होगें । सीने पर हाथ रखकर बताइए क्या जुगाड़ पर प्रतिबन्ध से देश ढंग से चल सकेगा? &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-8404622016975329203?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/8404622016975329203/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=8404622016975329203' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8404622016975329203'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8404622016975329203'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html' title='जुगाड़  से तो चल रहा है देश'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S6ekUzj_W5I/AAAAAAAAABg/AjbDfkTtAbI/s72-c/P1010731.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-9212119678686088385</id><published>2010-03-20T06:14:00.000-07:00</published><updated>2010-05-12T06:58:44.248-07:00</updated><title type='text'>मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;div style="text-align: left; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;strong&gt;मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;भाषा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत के रास्ते&lt;br /&gt;मैंने सुनीं&lt;br /&gt;ग्वाले के बांसुरी&lt;br /&gt;बांसुरी से याद आई&lt;br /&gt;कान्हा की बांसुरी&lt;br /&gt;बांसुरी की भाषा को&lt;br /&gt;मान्यता की नहीं जरूरत&lt;br /&gt;राग-रंग, हर्ष और दुख की&lt;br /&gt;होती सदैव एक ही भाषा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;बच्चे भगवान होते हैं!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चा अनजान होता है&lt;br /&gt;रीत-कायदा&lt;br /&gt;कब जाने!&lt;br /&gt;बच्चा नासमझ होता हैं&lt;br /&gt;दुनियादारी&lt;br /&gt;क्या समझे!&lt;br /&gt;बच्चे नादान होते हैं!&lt;br /&gt;बच्चे भगवान होते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;मन्नत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने मांगा&lt;br /&gt;सांवरे से&lt;br /&gt;केवल और केवल&lt;br /&gt;तुमको&lt;br /&gt;तुम्हारे बहाने&lt;br /&gt;सांवरे ने&lt;br /&gt;सौंप दी मुझे&lt;br /&gt;सारी दुनिया&lt;br /&gt;सचमुच&lt;br /&gt;अब मुझे&lt;br /&gt;तुम्हारी तरह&lt;br /&gt;अच्छी लगती है&lt;br /&gt;यह दुनिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;पाठशाला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीस वर्ष पुरानी&lt;br /&gt;दीवारें भी&lt;br /&gt;पढी-लिखी है यहां&lt;br /&gt;कान पक गए&lt;br /&gt;अ अनार&lt;br /&gt;आ आम की टेर सुनते&lt;br /&gt;सातवें सुर में&lt;br /&gt;वर्णमाला का बोलना&lt;br /&gt;मंत्रों से करता है होड़.&lt;br /&gt;यह पाठशाला&lt;br /&gt;कैसे कम है&lt;br /&gt;किसी मंदिर से ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;मेरा घर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवार से सटाकर रक्खी है&lt;br /&gt;पुरानी चारपाई&lt;br /&gt;झूले खाती मेज पर&lt;br /&gt;लगा है किताबों का ढ़ेर&lt;br /&gt;दीवारों पर लटक रहे हैं&lt;br /&gt;नए-पुराने कलैंडर&lt;br /&gt;आले में पड़ा है रेडियो&lt;br /&gt;खूंटियो पर टंगे है कपड़े.&lt;br /&gt;परंतु&lt;br /&gt;आठ बाई दस फ़ुट का&lt;br /&gt;मेरा यह कमरा&lt;br /&gt;साधारण तो नहीं है&lt;br /&gt;ब्रह्मा होने की&lt;br /&gt;मेरी ख्वाहिशों का&lt;br /&gt;साखी है.&lt;br /&gt;इसकी आबो-हवा में&lt;br /&gt;पसरी हुई है&lt;br /&gt;कई अनलिखी&lt;br /&gt;कालजयी कविताएं&lt;br /&gt;जो मुझे तलाश रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;**************&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अनुवाद- स्वयं कवि द्वारा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-9212119678686088385?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/9212119678686088385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=9212119678686088385' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/9212119678686088385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/9212119678686088385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-5328653787045610470</id><published>2009-12-19T02:43:00.000-08:00</published><updated>2010-05-12T07:00:40.963-07:00</updated><title type='text'>शहीद गाँव: कुछ स्मृति चित्र</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Syyu_bKsg0I/AAAAAAAAABY/7zaCUXN0_zE/s1600-h/P1010869.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416896856467473218" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 200px; height: 150px;" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Syyu_bKsg0I/AAAAAAAAABY/7zaCUXN0_zE/s200/P1010869.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(0, 153, 0);"&gt;राजस्थान के मरुकांतार क्षेत्र में वर्ष १९८४ में सेना के तोपाभ्यास हेतु महाजन फ़ील्ड फ़ायरिंग रेंज की स्थापना हुई तो चौंतीस गांवों को उजड़ना पड़ा. ये कविताएं विस्थापन की त्रासदी को सामुदायिक दृष्टिकोण से प्रकट करती है. कविताओं में प्रयुक्त मणेरा, भोजरासर, कुंभाणा उन विस्थापित गावों के नाम हैं जो अब स्मृतियों में बसे हैं.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(एक)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मरे नहीं हैं&lt;br /&gt;शहीद हुए हैं&lt;br /&gt;एक साथ&lt;br /&gt;मरूधरा के चौंतीस गाँव&lt;br /&gt;देश की खातिर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेना करेगी अभ्यास&lt;br /&gt;उन गाँवों की जमीन पर&lt;br /&gt;तोप चलाने का;&lt;br /&gt;महफूज रखेगी&lt;br /&gt;देश की सरहद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या देश के लोग&lt;br /&gt;उन गाँवों की शहादत को&lt;br /&gt;रखेंगे याद ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(दो)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;गाड़ों में लद गया सामान&lt;br /&gt;ट्रालियों में भर लिया पशुधन&lt;br /&gt;घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ तक&lt;br /&gt;उखाड़ कर डाल लिए ट्रक में&lt;br /&gt;गाँव छोड़ते वक्त लोगों ने,&lt;br /&gt;मगर अपना कलेजा&lt;br /&gt;यहीं छोड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(तीन)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसी भी कीमत पर&lt;br /&gt;नहीं छोड़ूंगा गाँव&lt;br /&gt;फूट-फूट कर रोए थे बाबा&lt;br /&gt;गाँव छोड़ते वक्त।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचमुच नहीं छोड़ा गाँव&lt;br /&gt;एक पल के लिए भी&lt;br /&gt;भले ही समझाईश के बाद&lt;br /&gt;मणेरा से पहुँच गए मुंबई&lt;br /&gt;मगर केवल तन से&lt;br /&gt;बाबा का मन तो&lt;br /&gt;आज भी&lt;br /&gt;भटक रहा है&lt;br /&gt;मणेरा की गुवाड़ में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते पच्चीस वर्षों से&lt;br /&gt;मुंबई में&lt;br /&gt;मणेरा को ही&lt;br /&gt;जी रहे हैं बाबा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(चार)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;घर नहीं&lt;br /&gt;गोया छूट गया हो पीछे&lt;br /&gt;कोई बडेरा&lt;br /&gt;तभी तो&lt;br /&gt;आज भी रोता है मन&lt;br /&gt;याद करके&lt;br /&gt;अपने गाँव को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(पाँच)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;तोप के गोलों से&lt;br /&gt;धराशाई हो गई हैं छतें&lt;br /&gt;घुटनें टेक दिए हैं&lt;br /&gt;दीवारों ने&lt;br /&gt;जमींदोज हो गए हैं&lt;br /&gt;कुएँ&lt;br /&gt;खंडहर में बदल गया है&lt;br /&gt;समूचा गाँव,&lt;br /&gt;मगर यहाँ से कोसों दूर&lt;br /&gt;ऐसे लोग भी हैं&lt;br /&gt;जिनके अंतस में&lt;br /&gt;बसा हुआ है&lt;br /&gt;अतीत का अपना&lt;br /&gt;भरा-पूरा गांव.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(छह)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अब नहीं उठता धुआं&lt;br /&gt;सुबह-शाम&lt;br /&gt;चूल्हों से&lt;br /&gt;मणेरा गाँव में।&lt;br /&gt;उठता है रेत का गुब्बार&lt;br /&gt;जब दूर से&lt;br /&gt;आकर गिरता है&lt;br /&gt;तोप का गोला&lt;br /&gt;धमाके के साथ&lt;br /&gt;तब भर जाता है&lt;br /&gt;मणेरा का आकाश&lt;br /&gt;गर्द से।&lt;br /&gt;यह गर्द नहीं&lt;br /&gt;मंजर है यादों का&lt;br /&gt;छा जाता है&lt;br /&gt;गाँव पर&lt;br /&gt;लोगों के दिलों में&lt;br /&gt;उठ कर दूर दिसावर से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(सात)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;उस जोहड़ के पास&lt;br /&gt;मेला भरता था गणगौर का&lt;br /&gt;चैत्र शुक्ला तीज को&lt;br /&gt;सज जाती मिठाई की दुकानें&lt;br /&gt;बच्चों के खिलोने&lt;br /&gt;कठपुतली का खेल&lt;br /&gt;कुश्ती का दंगल&lt;br /&gt;उत्सव बन जाता था&lt;br /&gt;गाँव का जीवन।&lt;br /&gt;उजड़ गया है गाँव&lt;br /&gt;अब पसरा है वहाँ&lt;br /&gt;मरघट का सूनापन&lt;br /&gt;हवा बाँचती है मरसिया&lt;br /&gt;गाँव की मौत पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(आठ)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गाँव था भोजरासर&lt;br /&gt;कुंभाणा में ससुराल&lt;br /&gt;मणेरा में ननिहाल&lt;br /&gt;कितना छतनार था&lt;br /&gt;रिश्तों का वट-वृक्ष।&lt;br /&gt;हवा नहीं हो सकती यह&lt;br /&gt;जरूर आहें भर रहा है&lt;br /&gt;उजाड़ मरुस्थल में पसरा&lt;br /&gt;रेत का अथाह समंदर।&lt;br /&gt;गाँवों के संग&lt;br /&gt;उजड़ गए&lt;br /&gt;कितने सारे रिश्ते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(नौ)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;कौन जाने&lt;br /&gt;किसने दिया श्राप&lt;br /&gt;नक्शे से गायब हो गए&lt;br /&gt;चौतीस गाँव।&lt;br /&gt;श्राप ही तो था&lt;br /&gt;अन्यथा अचानक&lt;br /&gt;कहाँ से उतर आया&lt;br /&gt;खतरा&lt;br /&gt;कैसे जन्मी&lt;br /&gt;हमले की आशंका&lt;br /&gt;हंसती-खेलती जिंदगी से&lt;br /&gt;क्यों जरूरी हो गया&lt;br /&gt;मौत का साजो-सामान?&lt;br /&gt;हजार बरसों में&lt;br /&gt;नहीं हुआ जो&lt;br /&gt;क्योंकर हो गया&lt;br /&gt;यों अचानक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(दस)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अब नहीं बचा है&lt;br /&gt;अंतर&lt;br /&gt;श्मसान और गाँव में।&lt;br /&gt;रोते हैं पूर्वज&lt;br /&gt;तड़पती है उनकी आत्मा&lt;br /&gt;सुनसान उजड़े गाँव में&lt;br /&gt;नहीं बचा है कोई&lt;br /&gt;श्राद्ध-पक्ष में कागोल़ डालने वाला&lt;br /&gt;कव्वे भी उदास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(ग्यारह)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;आज भी मौजूद है&lt;br /&gt;उजड़े भोजरासर की गुवाड़ में&lt;br /&gt;जसनाथ दादा का थान&lt;br /&gt;सालनाथ जी की समाधि&lt;br /&gt;जाळ का बूढ़ा दरखत&lt;br /&gt;मगर गाँव नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनसान थेहड में&lt;br /&gt;दर्शन दुर्लभ है&lt;br /&gt;आदमजात के&lt;br /&gt;फ़िर कौन करे&lt;br /&gt;सांझ-सवेरे&lt;br /&gt;मन्दिर मे आरती&lt;br /&gt;कौन भरे&lt;br /&gt;आठम का भोग&lt;br /&gt;कौन लगाए&lt;br /&gt;पूनम का जागरण&lt;br /&gt;कौन नाचे&lt;br /&gt;जलते अंगारों पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवता मौन है&lt;br /&gt;किसे सुनाए&lt;br /&gt;अपनी पीड़ा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-5328653787045610470?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/5328653787045610470/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=5328653787045610470' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5328653787045610470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/5328653787045610470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='शहीद गाँव: कुछ स्मृति चित्र'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Syyu_bKsg0I/AAAAAAAAABY/7zaCUXN0_zE/s72-c/P1010869.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-6915664216882387944</id><published>2009-11-22T18:45:00.000-08:00</published><updated>2010-05-12T07:04:49.364-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>हाथ में गुलाब का फूल (राजस्थानी कहानी)</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;हाथ में गुलाब का फूल&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(0, 153, 0);"&gt;मूल- श्यामसुन्दर भारती                       &lt;br /&gt;अनुवाद- डा. मदन गोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S-q1UUxfSTI/AAAAAAAAAB4/_sfcgYg4-2s/s1600/Red+Rose+In+Hand.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer; width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S-q1UUxfSTI/AAAAAAAAAB4/_sfcgYg4-2s/s200/Red+Rose+In+Hand.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470384058173180210" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;मरा। कौन जाने कितने वर्षों से बन्द पड़ा! न जाने कैसा-कैसा और क्या-क्या सामान। सामान नहीं, कबाड़ से भरा हुआ। वर्षों पुरानी किताबें और ये चीजें, और वे चीजें और आलतू-फालतू न जाने क्या-क्या! मुँह तक ठसाठस भरा हुआ। इतना सामान कि पैर धरने को भी जगह नहीं। ताक ऊपर धूल की परतों पर परतें जमी हुई। यह मोटी-मोटी थर आई हुई। नौकरी और फिर दुनिया भर की इतनी उलझनने कि एक पल भी सांस लेने की फुरसत नहीं, कि थोड़ी देर रुक कर विश्राम किया जा सके, कि कमरे के ताक को संभाला जा सके कि झाड़-पौंछ हो सके किसी दिन। बाहर -भीतर झांक कर देखा जा सके अन्धेरी कोटड़ी में, कि थोड़ी देर ठहरा जा सके, कि झांका जा सके किसी दिन खुद के अन्दर। नहीं-नहीं, इतनी फुरसत और वह भी आज के युग में!और यूं ही हर बार कि फिर कभी, कि बस फिर कभी ! इसी ऊहापोह में प्रत्येक दिन, कि एक दिन निश्चित करना है, कि इस बार, और उसी दिन करना ! पर नौकरी, बीबी -बच्चे, घर-परिवार, संगी-साथी, मिलने जुलने वाले और यहां के तथा वहां के और ये तथा वे न जाने क्या-क्या ? मतलब की उलझनें ही उलझनें। ठहराव को एक पल भी नहीं। व्यवधान इतने कि ठहरने अथवा रुकने का नाम भी नहीं। इसी तरह की उलझनों की ऊहापोह में वक्त अनंत पंखो से उड़ता रहा फुर्र-फुर्र ! मतलब कि अतीत के दर्पण पर धूल ही धूल ! नतीजन खुद पर तीव्र गुस्सा, झुंझलाहट और एक अनजान अनमनापन। और फिर मन मार कर एक दिन समय निकालना। मतलब कि साफ फालतू बोझ जैसे लगने वाले अनचाहे काम के लिए छुट्टी का एक कीमती दिन शहीद करना और झाड़नें-पौंछनें और सब कुछ इधर-उधर बिखेरने के लिए पालथी मार कर जम जाना।चारों तरफ पुरानी किताबें और यह, और वह और न जाने क्या-क्या ! आलतू-फालतू और कबाड़ से जूझने में मगन। कभी एक -एक चीज की बड़ी सावधानी से जांच परख, तो कभी बस एक उड़ती सी नजर। कहीं-कहीं थोड़ा रुककर अतीत को पढने की जुगत। कुछ ठीक-ठीक याद नहीं, एक धुंधली सी झलक, एक समृति की चमक। तो मगज में एक हलचल तथा अचरज कि अच्छा, यह ? और यह भी ? कि मैं तो बिलकुल भूल चुका। मगज पर जोर देकर याद करके ही चेष्टा कि कब? कि किस घड़ी? फिर थोड़ी देर याद करने की खपत करने के बाद तसल्ली कि अरे हां , यह तो तब, और यह उस घड़ी, और उस वक्त। पर सब कुछ शायद या अगर -मगर। और इस तरह धीरे-धीरे........धीरे-धीरे यादों की बन्द कोटड़ी में सरकता जाना, धीरे-धीरे......धीरे-धीरे पिछले दिनों के पीछे..........और पीछे।फिर तो एक-एक चीज को बड़ी सतर्कता से जांचना-परखना, तथा नजरों को बाहर निकालना कि अरे हां...... ये तो तब की....... और यह जब की ! कि इसी बीच अचानक निगाहों का कुछ किताबों पर ठहर जाना। और देखते हुए दुखी हो जाना। किताबों का खासा हिस्सा दीमक चाट कर साफ कर चुके। तो बहुत गहरे तक मन में पीड़ा के बुलबुलों का उठना, तो गहरे मोह और घनी पीड़ में पगी बेबसी से उन किताबों की ओर देखना और फिर देर तक अपलक देखते जाना, देखते ही जाना। और आखिरकार भारी मन से उन किताबों को कचरे की टोकरी में बाहर फैंकने के लिए डाल देना। और इसके साथ बाकी बची हुई चीजों की झाड़-पौंछ में लग जाना। उनकी जांच परख में खो जाना कि उनमें डूबने के सम्मोहन में सो जाना। उसी वक्त अचानक कुछ याद आते ही एक झटके के साथ झिझक कर जागना और जैसे बिजली की गति से लपक कर अभी-अभी कचरे की टोकरी में डाली किताबों में से एक किताब को वापस उठाना, जैसे कि वह दुनिया की सबसे अनमोल किताब हो।क्या कुछ ? पर शायद कुछ था जो वक्त व दीमकों द्वारा चाटी हुई किताबों के साथ कचरे की टोकरी में फेंक दिया गया था, जो अतीत की गहरी परतों और सालों साल के घटाटोप कोहरे की गहरी कालिमा के बावजूद मानो यादों के आकाश में काले बादलों में बिजली की चमक की एक पतली सी रेखा की तरह अचानक कौंधा था। जैसे बड़ी सावधानी से , धीरे से उस किताब को पकड़ना और बड़े जतन से एक-एक पन्ने का उलट-पलट कर ध्यान से देखना.........कि दीमक झाड़ने की जुगत में किताब का हाथ से छूट कर नीचे गिर जाना....नीचे गिरते ही किताब का खुल जाना.... कि वक्त की मार से किताब के सड़े-गले पन्नों के बीच से सिमसिम का खुलना........एक सूखा हुआ गुलाब का फूल .......डाली और पत्तियों समेत ......और नजरों का उसी पर ठहर जाना.........जड़ हो जाना।समूची चेतना अपनी एकल अवस्था में एक बिन्दु पर टिकी हुई-न इधर , न उधर ,न आस, न पास । दृष्टि थमी हुई तथा एक जगह जमी हुई । डाली पत्तियों समेत सूखा हुआ गुलाब का फूल। बस, फूल ! कि अचानक डाली हरी होने लगी। पंत्तियां ताजी, और फूल जैसे आज ही खिला हो ! और तभी फूल से सुगन्ध आने लगी। सुवास नथुनों से होती हुई अन्दर तक उतरने लगी और एकदम खिला हुआ गुलाब का फूल। अपनी मदभीनी खुशबू बिखेरता हुआ। ठीक वैसा ही, जैसा कि उस दिन रेशमी रुमाल में लपेट कर उसने प्रीत की पहली निशानी के रूप में दिया था। उस सुहाने पल-क्षण में पूरी तरह डूबी मनगत, दोनों के नयनों में प्रीत के लाल-गुलाबी डोरे। बस, साक्षात वही पल ! प्रीत की हिलोरें भरता हुआ अथाह सागर। चिमटी में डाली, डाली पर हरी पंत्तियां , ऊपर प्रीत की मनमोहक खुशबू बिखेरता मुस्कराता हुआ गुलाब का फूल !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-6915664216882387944?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/6915664216882387944/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=6915664216882387944' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/6915664216882387944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/6915664216882387944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2009/11/blog-post_1395.html' title='हाथ में गुलाब का फूल (राजस्थानी कहानी)'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/S-q1UUxfSTI/AAAAAAAAAB4/_sfcgYg4-2s/s72-c/Red+Rose+In+Hand.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-8248991383739377286</id><published>2009-11-22T18:37:00.000-08:00</published><updated>2010-05-12T07:06:10.434-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>राजस्थानी कहानी</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;नीम न मीठो होय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong style="color: rgb(0, 153, 0);"&gt;मूल राजस्थानी कहानी : रामेश्वर गोदारा 'ग्रामीण'&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Swn1yVPQuAI/AAAAAAAAABA/MOrB-ZKXgrs/s1600/Neem_tree.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407123072678410242" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 150px; height: 200px;" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Swn1yVPQuAI/AAAAAAAAABA/MOrB-ZKXgrs/s200/Neem_tree.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;ले&lt;/strong&gt;किन बापू के सामने क्या कहेगी। बड़े साब से कैसे बता पाएगी वह सब, जो उसके साथ हुआ। केवल सलवार दिखाने से ही साब समझ जाएंगे। साब उसे न्याय दिलाएंगे। उस दरिन्दे को पकड़ कर जेल में डाल देंगे। उसे न्याय मिल जाएगा। साब बड़े आदमी हैं। गरीबों की भी सुनेंगे। वे बिकने वाले नहीं है। थानेदार की तरह वे सरपंच की नहीं सुनेंगे।अन्दर बैठे साब ने उनको बाहर बैठकर इंतजार करने के लिए कहा है। अन्दर कोई जरूरी खुसर-फुसर चल रही है। दोनों बाप-बेटी बाहर खड़े नीम तले आकर फ्रीज हो गए हैं। नीम की हरियाली पीलेपन से दबी जा रही है। हवा बंद है। उन दोनों के बीच पसरा हुआ मौन अंगड़ाई तोड़ रहा है। लड़की जवान है। सोलह बरस की। बाप बूढ़ा है। एकदम चरमराया हुआ। बूढ़े के चेहरे पर झुर्रियों का रामराज्य है और इस रामराज्य की बॉडीगार्ड बनी हुई डाढ़ी इधर-उधर मुस्तैद खड़ी है। बूढ़े की गरदन के दोनों तरफ दो पिल्लर जैसी नसें तनी हुई खड़ी हंै। शायद इन पिल्लरों के भरोसे ही बूढ़े का सिर अपनी जगह मौजूद है। इसी सर में कीड़े कुलबुला रहे हैं। ये कीड़े पिछले तीन-चार दिनों से उसे कच-कच काटते चले आ रहे हैं। बूढ़ा जब भी इन कीड़ों को बाहर निकाल फैंकने के लिए सर झटकता है तब कीड़े सांप बनकर उसके भेजे में घूमने लगते हंै। इन सांपों को मारने के लिए बूढ़े के पास कोई साधन नहीं है लेकिन फिर भी वह इनका सामना करने की सोचता है। वे सांप फण तानकर फुंफकारते हैं। उसे बार-बार डसते है लेकिन बूढ़ा मरता नहीं। उसे दिल का दौरा नहीं पड़ता। इस जहर से बूढ़े का चेहरा उस मरुस्थल जैसा बन गया, जिसके झाड़-झंखाड़ों को भेड़-बकरियों ने चर लिया हो। बूढ़े की धंसी हुई आंखों में पानी तो है लेकिन सपने पथरा गए है। वे सारे सपने जिनका ताना-बाना बूढ़े ने आज तक बड़े जतन से बुना था अब चदरिया बुनने से कन्नी काट रहे हैं। लड़की सलवार-कुरता पहने सलीके से औकडू बैठी है। बापू के ठीक सामने। उसके हाथ में नीम का तिनका कैद है। वो उसे धरती पर चलाए जा रही है-बेतरतीब। कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें बन रही हैं, मगर कोई चित्र नहीं बन पाता। चित्र तो बेचारी लड़की की कल्पनाओं में भी नहीं है। लड़की एक क्षण के लिए नजर उठाकर बापू की ओर देखती है। बापू कहीं गहरे डूबे हुए है। लड़की सोचती है कि वह बापू के लिए बूढ़ापे की लाठी तो नहीं बन पाई, उलटा उनकों ही लंगड़ा कर डाला। अब वे ज्यादा दिन जी नहीं पाएंगे। यदि वह नहीं होती, तो बापू आधी मौत नहीं मरते। तभी उनके बीच नीम का एक पत्ता आकर गिर जाता है। एक बार दोनों यूं ही उसे देख भर लेते है। पत्ते पर उनकी किस्मत लिखी हुई नहीं है। पत्ते से ध्यान हटते ही दोनों बाप-बेटी फिर एक दूसरे को देखते हैं लेकिन पल भर में ही ध्यान हटा लेते हंै। दोनों की हिम्मत जवाब दे चुकी है। लड़की बापू से आंख नहीं मिला सकी, तो उसने सीधी सड़क पर देखना शुरू कर दिया। दोपहर की तेज धूप में सूनी पड़ी सड़क उसे विकराल काली नागिन-सी लहराती नजर आई। लू से उसे ऐसा लगा, जैसे वह नागिन लोटपोट खाते हुए ऊपर-नीचे होकर सांस ले रही है और इसी तरफ आ रही है। लड़की डर गई। उसे लगा, मानों सड़क उसे निगलना चाहती है। उसने सड़क से ध्यान हटा लिया तथा सामने वाले दरवाजे की ओर देखा। वहां संतरी पहरा लगा रहा था। जबसे वह यहां आई है तब से संतरी उसे ताक रहा है। तंग आकर लड़की ने अपना ध्यान नीम तक ही समेट लिया। नीम के नीचे बापू का उदास चेहरा पड़ा है- भूखे बैल जैसा। वो बापू का चेहरा देर तक नहीं देख पाई। उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। उसे बापू पर दया आ रही है। वो सोचने लगी-वह बापू से बात करेगी। परन्तु क्या? बापू क्या सोच रहा है। वह कब से मुर्दे की तरह बैठा है। उसने एक बार फिर बापू के चेहरे को देखा। बोलना चाहा लेकिन बोल नहीं पाई। अपना ध्यान बंटाने की गरज से उसने ऊपर देखा। ऊपर नीम के फैले हुए डालों को देखकर लड़की ने सोचा- कहीं यह नीम टूट जाए और वह इसके नीचे दबकर मर जाए। फिर उसे बापू को अपना चेहरा कभी दिखाना नहीं पड़े। वह जीवित रहकर भी क्या करेगी? कैसे दिखाएगी बापू को अपना काला मुंह। उसने मन ही मन कहा- हे भगवान, यह नीम मेरे ऊपर गिरा दे। लेकिन नीम पर भगवान नहीं है। नीम पर खुद उदासी नाच रही है। उसी उदासी का एक पीला-सा घुंघरू उनके बीच आकर गिर जाता है। दोनों अचानक वर्तमान में आकर कुछ क्षणों के लिए उसकी ओर देखते है। दोनों में कातरता कुतर-कुतर कर रही है, इधर बेचैनी ब्याज-सी बढ़ रही है। बूढ़े ने इधर-उधर देखकर अपनी कातरता को दबाया और जेब से चिलम-तम्बाकू निकाल कर पान जचाया। फिर खड़ा होकर अगल-बगल से पांच-सात पत्ते और मुट्ठी भर कचरा चुग कर ले आया। आग जलाकर उसने अंगारों को चिलम में डाल लिया और दम भरकर खींचने लगा। कई देर तक वह सब कुछ भूलकर चिलम के धूंए में जीवन के राग को ढूंढऩे का प्रयास करता रहा। चिलम से बूढ़े के ग्लूकोज-सी चढ़ गई। उसमें ताकत का संचार हुआ। उसने एक-दो बार संतरी की तरफ देखा। बूढ़े के मन में आया कि उससे बात करके देखे। शायद काम बन जाए। लेकिन बात कैसे करें, यदि उसने झिड़क दिया तो। ऐसा सोचते ही बूढ़े की हिम्मत टूट गई। लड़की ने बापू से आंखे बचाकर अपनी झोली में पड़े थैले में देखा। उसकी पीड़ा जाग उठी। सलवार अब भी बदरंग पड़ी है। उसमें लगा हुआ खून अब उस दिन जैसा लाल नहीं, मटमैला हो गया। धरती पर गिरे सूखे चीड़ जैसा। लड़की की सोच साकार होने लगी। आज वह बड़े साब को सलवार दिखाएगी। कहेगी... लेकिन बापू के सामने क्या कहेगी। बड़े साब से कैसे बता पाएगी वह सब, जो उसके साथ हुआ। केवल सलवार दिखाने से ही साब समझ जाएंगे। साब उसे न्याय दिलाएंगे। उस दरिन्दे को पकड़ कर जेल में डाल देंगे। उसे न्याय मिल जाएगा। साब बड़े आदमी हैं। गरीबों की भी सुनेंगे। वे बिकने वाले नहीं है। थानेदार की तरह वे सरपंच की नहीं सुनेंगे। लड़की ने थैले में पड़ी सलवार को हाथ से नीचे छिपाने की सोची, लेकिन बापू के देखने के डर से विचार बदल दिया। उदासी से घिरा हुआ बूढ़ा कहीं खोया हुआ-सा बैठा है। अचानक उसका ध्यान अपनी धोती की ओर चला जाता है। धोती जगह-जगह से फटी हुई है। फटी धोती को उसने कई जगह गांठ बांध कर जोड़ रखा है। पहनने लायक नहीं रही, लेकिन फिर भी उसने पहन रखी है। धोती से भी बदतर हाल है उसके कुरते का। कुरते की एक बाजू गायब है। बचे हुए कुरते पर ढेर सारे पैबंद लगे है। बूढ़ा सोचता है कि साब के सामने इन कपड़ों में जाएगा, तो उनको कितना अटपटा लगेगा। क्या सोचेंगे वे। यह सब देखने से पहले तो उसे मर जाना चाहिए था। उसकी इज्जत पर फटे हुए कपड़ों से क्या फर्क पड़ेगा। जब इज्जत ही फट गई, तो कपड़ों का क्या? पैबंद लगे हुए शरीर को कौन अपनाएगा? कहीं उसकी बेटी कुंवारी तो नहीं रह जाएगी। नीम पर बैठे कौवे की कांव-कांव ने उसकी विचार शृंखला को तोड़ दिया। तभी संतरी की पथरीली आवाज उसके कानों से आ टकरायी -'ओय बूढ़े! आजा डी.एसपी. साब बुला रहे है। बूढ़ा इसी का इंतजार कर रहा था। उसकी मुराद पूरी हो गई। एकबारगी तो उसे लगा कि उसके अन्दर कहीं चूसे के बच्चे नाच-गा रहे हैं। दिल मे खुशी समा नहीं रही थी। उसने सोचा कि उसे न्याय मिल जाएगा। सब कह डालेगा रो-रोकर। बूढ़े के घुटनों में घोड़े जैसी ताकत आ गई। लड़की ने हाथ का तिनका फेंक कर जमीन पर खींची लकीरों को पांव से मिटाया, थैला सम्भाला तथा बापू के पीछे-पीछे चल पड़ी। चलते हुए उसने एक बार फिर थैले में सरसरी नजर से देखा। सलवार अब भी बदरंग है। गेट में घुसते वक्त संतरी ने फिर उनको घूरा, लेकिन अपनी सोच पर सवार बाप-बेटी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। दफ्तर में प्रवेश करते ही बूढ़े ने दण्डवत किया। साब ने उनकों कुर्सियों की ओर बैठने के लिए इशारा किया, लेकिन वे कुर्सियों की बजाय साब के पांवों में नीचे ही बैठ गए।'हां तो बोलो?'- एक भारी भरकम आवाज बूढ़े के कानों में आ फंसी। 'साब बोलने लायक तो उसने छोड़ा ही नहीं। अब न्याय आपके हाथों में है।'- एक कांपती गुहार बूढ़े के कंठों से निकली। 'बोलो क्या चाहते हो। कहो तो बोरी दो बोरी गेहूं दिलवा दूं। अकाल ठीक से कट जाएगा।' साब की बात सुनते ही बूढ़े की उम्मीदें आंखों की बाढ़ में बह गई। सारे सपने सफेदे की लकड़ी की तरह टूट गए। पैरों में बर्फ जमने लगी। उठते वक्त वो लकवा मारती जुबान से इतना ही फूट पाया- 'गेहूं और इज्जत में बहुत फर्क होता है साब, कभी वक्त आए, तो लेकर देख लेना।' लड़की अपनी आशाओं की अर्थी कंधों पर उठाए बापू के पीछे चल पड़ी। वह अब भी उदास थी और सलवार बदरंग। नीम तले गुजरते बूढ़े ने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा। नीम पहले की तरह खड़ा है, जिस पर सुनेड़ अपना लहंगा बिछाए बैठी है- खामोश! &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;अनुवाद: डॉ. मदनगोपाल लढ़ा&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-8248991383739377286?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/8248991383739377286/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=8248991383739377286' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8248991383739377286'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/8248991383739377286'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='राजस्थानी कहानी'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/Swn1yVPQuAI/AAAAAAAAABA/MOrB-ZKXgrs/s72-c/Neem_tree.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2475011007145413299.post-4513941194467437528</id><published>2009-11-19T10:30:00.000-08:00</published><updated>2010-05-12T07:09:54.728-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं</title><content type='html'>&lt;strong style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कविता से ज्यादा&lt;/strong&gt;&lt;a style="color: rgb(255, 0, 0);" href="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SwWQcYrI94I/AAAAAAAAAA4/1i9M2Sjw4NQ/s1600/25477878555.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5405885745062279042" style="margin: 0px 10px 10px 0px; float: left; width: 181px; height: 200px;" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SwWQcYrI94I/AAAAAAAAAA4/1i9M2Sjw4NQ/s200/25477878555.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कौन कहता है&lt;br /&gt;मैंने कुछ नहीं लिखा&lt;br /&gt;इन दिनों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता में शब्द होते हैं&lt;br /&gt;प्राण&lt;br /&gt;जीवन का आधार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने रचा है&lt;br /&gt;जीवन !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सोच&lt;br /&gt;मेरा रचाव..&lt;br /&gt;कविता से&lt;br /&gt;कुछ ज्यादा ही होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कविता के आस-पास&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;दोस्त कहता है-&lt;br /&gt;बावरे हो गए हो क्या&lt;br /&gt;क्या सोचते हो&lt;br /&gt;अकेले बैठे&lt;br /&gt;आओ घूमने चलते हैं&lt;br /&gt;गुवाड़ में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे समझाऊं&lt;br /&gt;गुवाड़ तो गुवाड़&lt;br /&gt;मैं तो घूम लेता हूं&lt;br /&gt;समूची सृष्टि में&lt;br /&gt;कविता के इर्द-गिर्द&lt;br /&gt;अकेले बैठे-बिठाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;नहीं है भरोसा शब्दकोष का&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;कैसे भरोसा करूं&lt;br /&gt;शब्दकोष का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरूरी नहीं है&lt;br /&gt;कि शब्द का अर्थ&lt;br /&gt;असल जिन्दगी में भी&lt;br /&gt;वही हो&lt;br /&gt;जैसा लिखा होता है&lt;br /&gt;शब्दकोश में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके लिए&lt;br /&gt;हर्ष का मतलब&lt;br /&gt;उत्सव हो सकता है&lt;br /&gt;लेकिन मेरे लिए&lt;br /&gt;इसका अर्थ&lt;br /&gt;फ़गत रोटी है.&lt;br /&gt;आशा का मतलब&lt;br /&gt;मेरे संदर्भ में&lt;br /&gt;इंतजार है&lt;br /&gt;जो आपको&lt;br /&gt;किसी भी शब्दकोष में&lt;br /&gt;नहीं मिलेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्दकोष की तरह&lt;br /&gt;नहीं है मेरा जीवन&lt;br /&gt;अकारादि क्रम में&lt;br /&gt;बिखरा हुआ है&lt;br /&gt;बेतरतीब&lt;br /&gt;शब्द पहेली की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;स्मृति की धरती पर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;अनजान मार्ग परचलते हुए&lt;br /&gt;याद आते हैं&lt;br /&gt;कई चेहरे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके सच की&lt;br /&gt;साख भरती है स्मृति&lt;br /&gt;सबूत है शब्द&lt;br /&gt;उनके वजूद का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डग-मग डोलता जीव&lt;br /&gt;हृदय के आंगन में&lt;br /&gt;भटकता है&lt;br /&gt;पीछे भागती है&lt;br /&gt;एक अप्रिय छाया&lt;br /&gt;बेखौफ़.&lt;br /&gt;&lt;br 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के फोटोग्राफ़&lt;br /&gt;बांचना चाहता हूं&lt;br /&gt;कॊलेज जीवन की डायरी&lt;br /&gt;और तिप्पड़ खाट लगाकर&lt;br /&gt;चांदनी रात में&lt;br /&gt;सुनना चाहता हूं रेडियो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तुम्हारे मिलने का मतलब&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;पहली नजर में&lt;br /&gt;तुम्हारे लिए&lt;br /&gt;मेरे हृदय में&lt;br /&gt;जन्मी एक चाह&lt;br /&gt;कैसे ही हो&lt;br /&gt;तुमसे जान-पहचान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसी मुलाकात है यह&lt;br /&gt;ओ मेरी जोगन !&lt;br /&gt;ज्यों-ज्यों&lt;br /&gt;मैं जानता हूं तुमको&lt;br /&gt;खुद को भूलता हूं&lt;br /&gt;अंतर की अंधेरी सुरंग में&lt;br /&gt;उतरता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच बता !&lt;br /&gt;तुम्हारे मिलने का मतलब&lt;br /&gt;कहीं मेरा खोना तो नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;नहर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;नहर पहचानती है&lt;br /&gt;अपनी हद&lt;br /&gt;वह न तो नदी है&lt;br /&gt;न ही समुद्र&lt;br /&gt;सपना भी नहीं  पालती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहर जानती है&lt;br /&gt;माप-जोख की जिंदगानी&lt;br /&gt;बारह हाथ चौड़ी&lt;br /&gt;पांच हाथ गहरी&lt;br /&gt;सात रोजा बारी&lt;br /&gt;और टेल का सूखापन&lt;br /&gt;उसकी मान-मर्यादा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमजोर घर की&lt;br /&gt;भंवरी-कंवरी है नहर&lt;br /&gt;बचपन में ही&lt;br /&gt;हो जाती है सयानी&lt;br /&gt;उम्र भर पचती है&lt;br /&gt;हरियल पत्तों से&lt;br /&gt;ढकने के लिए&lt;br /&gt;उघाड़े धोरों को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;एक बुरा सपना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;वह लपर-लपर करके&lt;br /&gt;बूक से&lt;br /&gt;गर्म रक्त पी रही है&lt;br /&gt;अंधेर घुप्प में&lt;br /&gt;बिजली की तरह&lt;br /&gt;चमकती है उसकी आंखें&lt;br /&gt;मौन में सरणाट बजती है&lt;br /&gt;उसकी सांस&lt;br /&gt;मैं अकेला&lt;br /&gt;डर से कांपता&lt;br /&gt;कभी उसे देखता हूं&lt;br /&gt;कभी हाथ में&lt;br /&gt;इकट्ठा की हुई कविताओं को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;इंतजार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;अब छोडिए भाईजी !&lt;br /&gt;किसे परवाह है&lt;br /&gt;आपके गुस्से की&lt;br /&gt;इस दुनिया में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिल सको तो&lt;br /&gt;एकमेक हो जाओ&lt;br /&gt;इस मुखोटों वाली भीड़ में&lt;br /&gt;या फ़िर&lt;br /&gt;मेरी तरह&lt;br /&gt;धार लो मौन&lt;br /&gt;इस भरोसे&lt;br /&gt;कि कभी तो आएगा कोई&lt;br /&gt;मेरी पीड़ा परखने वाला&lt;br /&gt;आए भले ही&lt;br /&gt;आसमान से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;यकीन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;तुमसे प्रेम करते वक्त&lt;br /&gt;कब सोचा था मैंने&lt;br /&gt;कि इस तरह&lt;br /&gt;बिखर जाएगा&lt;br /&gt;हमारे सपनों का संसार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी&lt;br /&gt;याद के बहाने&lt;br /&gt;मैं देख लेता हूं&lt;br /&gt;मन के किसी कोने में&lt;br /&gt;उस दुनिया के निशान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे यकीन है&lt;br /&gt;कि तुम भी&lt;br /&gt;कभी-कभार तो&lt;br /&gt;जरूर संभालती होंगी&lt;br /&gt;उस संचित सुख को&lt;br /&gt;इसी तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;आओ तलाशें वे शब्द&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;वेद कहते हैं&lt;br /&gt;इस सृष्टि में&lt;br /&gt;अभी तक स्थिर है&lt;br /&gt;वे शब्द&lt;br /&gt;जिनसे रचे गए मंत्र&lt;br /&gt;युगों की साधना से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ मेरे सृजक !&lt;br /&gt;आओ तलाशें&lt;br /&gt;उन शब्दों को&lt;br /&gt;पहचानें&lt;br /&gt;उनके तेज को&lt;br /&gt;उतारें&lt;br /&gt;उन मंत्रों की आत्माओं को&lt;br /&gt;हमारी कविता में&lt;br /&gt;साधे संबध&lt;br /&gt;उनकी गूंज से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िर देखना&lt;br /&gt;हमारी कविता&lt;br /&gt;कम नहीं होगी&lt;br /&gt;किसी मंत्र से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;यादों का समुद्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सचमुच&lt;br /&gt;बहुत अच्छा लगता था&lt;br /&gt;दोस्तों के साथ&lt;br /&gt;तुमसे नेह का&lt;br /&gt;बखान करते&lt;br /&gt;सारी-सारी रात.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जुदा है&lt;br /&gt;कि आज&lt;br /&gt;मुंह पर लाना भी&lt;br /&gt;पाप समझता हूं&lt;br /&gt;वे कथाएं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मेरा मन&lt;br /&gt;अब तक नहीं भूला है&lt;br /&gt;उन यादों के समुद्र में&lt;br /&gt;गोता खाने का सुख.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;प्रीत के रंग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;झूठ नहीं कहा गया है&lt;br /&gt;कि प्रीत के&lt;br /&gt;रंग होते है हजार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक्त की फ़िजां में&lt;br /&gt;मैं सूंघता था&lt;br /&gt;प्रीत की खुशबू&lt;br /&gt;रातों रास करता&lt;br /&gt;सपनों के आंगन&lt;br /&gt;हृदय रचता&lt;br /&gt;एक इन्द्रधनुष.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदले हुए वक्त में&lt;br /&gt;आज भी&lt;br /&gt;मेरे सामने है&lt;br /&gt;प्रीत के नए-निराले रंग&lt;br /&gt;चित्र जरूर बदल गए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद&lt;br /&gt;इस बेरंग होती दुनिया को&lt;br /&gt;रंगीन देखने के लिए&lt;br /&gt;जरूरी है&lt;br /&gt;प्रीत रंगी आंखे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;मेरे हिस्से की चिंताएं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;मुझे सवेरे उठते ही&lt;br /&gt;चारपाई की दावण खींचनी है&lt;br /&gt;पहली तारीख को अभी सतरह दिन बाकी है&lt;br /&gt;पर बबलू की फ़ीस तो भरनी ही पड़ेगी.&lt;br /&gt;पत्नी के साथ रिश्तदारी में हुई गमी पर  जाना है&lt;br /&gt;कल डिपो पर  फ़िर मिलेगा केरोसीन तेल&lt;br /&gt;मैंने यह भी सुना है कि&lt;br /&gt;ताजमहल का रंग पीला पड़ रहा है इन दिनों&lt;br /&gt;सिरहाने रखी किताब से मैंने&lt;br /&gt;अभी आधी कविताएं ही पढ़ी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 153, 0);"&gt;प्रेम पत्र : पांच चित्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;  &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;एक)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;तुम्हारा प्रेम पत्र&lt;br /&gt;मैंने संभाल रखा है&lt;br /&gt;ओरिये की संदूक में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज सुबह देखता हूं&lt;br /&gt;प्रीत की वह अनमोल निशानी&lt;br /&gt;चाव से बांचता हूं&lt;br /&gt;प्रेम के आखर&lt;br /&gt;अचानक हरा हो जाता है&lt;br /&gt;समय का सूखा ठूंठ&lt;br /&gt;अंतर में उतरने लगती है&lt;br /&gt;मधरी-मधरी महक.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा प्रेम पत्र&lt;br /&gt;समुद्र बन जाता है&lt;br /&gt;स्मृति के आंगन में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;   &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(दो)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;रेशमी रुमाल में लपेटकर&lt;br /&gt;जिस तरह&lt;br /&gt;तुमने मुझे सौंपा था&lt;br /&gt;पहला प्रेम-पत्र&lt;br /&gt;आज भी लगता है मुझे&lt;br /&gt;सपना सरीखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभार&lt;br /&gt;एक सपने में ही&lt;br /&gt;गुजर जाती है&lt;br /&gt;समूची जिंदगानी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(तीन)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;तुम्हारे प्रेम पत्र में&lt;br /&gt;अब तक बाकी है&lt;br /&gt;तुम्हारे स्पर्श की सौरभ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखर की आरसी में&lt;br /&gt;मैं चीन्हता हूं&lt;br /&gt;तुम्हारा चेहरा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रीत का पुराना पत्र&lt;br /&gt;एक इतिहास है&lt;br /&gt;अपने-आप में&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;  (चार)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;पुराना कागज&lt;br /&gt;पोच गया&lt;br /&gt;फ़ीका पड़ गया&lt;br /&gt;आखरों का रंग&lt;br /&gt;प्रीत की पहली पाती पर&lt;br /&gt;जम गई&lt;br /&gt;वक्त की गर्द.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किंतु आज भी है&lt;br /&gt;तुम्हार इंतजार !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;(पांच)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;समझदारी है&lt;br /&gt;फ़ाड़ कर जला देना&lt;br /&gt;पुराने प्रेम-पत्रों को&lt;br /&gt;जो चुगली कर सकते हैं&lt;br /&gt;उस प्रेम की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर कैसे मिटाऊं&lt;br /&gt;मन की पाटी लिखे हुए&lt;br /&gt;प्रीत के आखरों को&lt;br /&gt;जो कविता के बहाने&lt;br /&gt;खुदबखुद बताते रहते हैं&lt;br /&gt;वे कथाएं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left; font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;strong&gt;अनुवाद&lt;/strong&gt; :   स्वयं&lt;br /&gt;संपर्क- १४४, लढ़ा-निवास, महाजन, जिला- बीकानेर  (राजस्थान),  भारत&lt;br /&gt;पिनकोड-३३४६०४ मो.-०९९८२५०२९६९&lt;br /&gt;&lt;a href="madanrajasthani@gmail.com"&gt;madanrajasthani@gmail.com&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2475011007145413299-4513941194467437528?l=madangopalladha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madangopalladha.blogspot.com/feeds/4513941194467437528/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2475011007145413299&amp;postID=4513941194467437528' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/4513941194467437528'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2475011007145413299/posts/default/4513941194467437528'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madangopalladha.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं'/><author><name>मदन गोपाल लढ़ा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05070459363183015349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='27' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SiEgXNTKXkI/AAAAAAAAAAM/pV0e8m6cokQ/S220/Madan+Ladha%5B1%5D.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__WV_chGQzD4/SwWQcYrI94I/AAAAAAAAAA4/1i9M2Sjw4NQ/s72-c/25477878555.gif' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry></feed>
