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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

मदन गोपाल लढ़ा की राजस्थानी कविताएं

कविता से ज्यादा
कौन कहता है
मैंने कुछ नहीं लिखा
इन दिनों.

कविता में शब्द होते हैं
प्राण
जीवन का आधार.

मैंने रचा है
जीवन !

अब सोच
मेरा रचाव..
कविता से
कुछ ज्यादा ही होगा.


कविता के आस-पास
दोस्त कहता है-
बावरे हो गए हो क्या
क्या सोचते हो
अकेले बैठे
आओ घूमने चलते हैं
गुवाड़ में.

कैसे समझाऊं
गुवाड़ तो गुवाड़
मैं तो घूम लेता हूं
समूची सृष्टि में
कविता के इर्द-गिर्द
अकेले बैठे-बिठाए.


नहीं है भरोसा शब्दकोष का
कैसे भरोसा करूं
शब्दकोष का

जरूरी नहीं है
कि शब्द का अर्थ
असल जिन्दगी में भी
वही हो
जैसा लिखा होता है
शब्दकोश में.

आपके लिए
हर्ष का मतलब
उत्सव हो सकता है
लेकिन मेरे लिए
इसका अर्थ
फ़गत रोटी है.
आशा का मतलब
मेरे संदर्भ में
इंतजार है
जो आपको
किसी भी शब्दकोष में
नहीं मिलेगा.

शब्दकोष की तरह
नहीं है मेरा जीवन
अकारादि क्रम में
बिखरा हुआ है
बेतरतीब
शब्द पहेली की तरह.


स्मृति की धरती पर
अनजान मार्ग परचलते हुए
याद आते हैं
कई चेहरे.

जिनके सच की
साख भरती है स्मृति
सबूत है शब्द
उनके वजूद का.

डग-मग डोलता जीव
हृदय के आंगन में
भटकता है
पीछे भागती है
एक अप्रिय छाया
बेखौफ़.

खुद से भागता जीव
अंतस की आरसी में
तलाशता है
अनजान चेहरे
और बांचता है
स्मृति की धरती पर
जीवन के आखर.


रचाव
मैं एक भाव
बीज रूप शाश्वत
तुम्हारे अर्पण.

तुम मेरी भाषा
भाव मुताबिक गुण
संवार - संभाल.

हमारा रचाव
जैसे मंत्र
जैसे छंद
जीता-जागता काव्य


अबके रविवार
सोम से शनि तक
सिटी बस के पीछे भागते
सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव की
गणित के साथ सर खपाते
कंप्यूटर के की-पेड से
उलझते
तंग आ गया हूं मैं
बुरी तरह,
अबके रविवार
मैं देखना चाहता हूं
पुराने एलबम के फोटोग्राफ़
बांचना चाहता हूं
कॊलेज जीवन की डायरी
और तिप्पड़ खाट लगाकर
चांदनी रात में
सुनना चाहता हूं रेडियो.


तुम्हारे मिलने का मतलब
पहली नजर में
तुम्हारे लिए
मेरे हृदय में
जन्मी एक चाह
कैसे ही हो
तुमसे जान-पहचान.

कैसी मुलाकात है यह
ओ मेरी जोगन !
ज्यों-ज्यों
मैं जानता हूं तुमको
खुद को भूलता हूं
अंतर की अंधेरी सुरंग में
उतरता हूं.

सच बता !
तुम्हारे मिलने का मतलब
कहीं मेरा खोना तो नहीं है.


नहर
नहर पहचानती है
अपनी हद
वह न तो नदी है
न ही समुद्र
सपना भी नहीं पालती.

नहर जानती है
माप-जोख की जिंदगानी
बारह हाथ चौड़ी
पांच हाथ गहरी
सात रोजा बारी
और टेल का सूखापन
उसकी मान-मर्यादा है.

कमजोर घर की
भंवरी-कंवरी है नहर
बचपन में ही
हो जाती है सयानी
उम्र भर पचती है
हरियल पत्तों से
ढकने के लिए
उघाड़े धोरों को.


एक बुरा सपना
वह लपर-लपर करके
बूक से
गर्म रक्त पी रही है
अंधेर घुप्प में
बिजली की तरह
चमकती है उसकी आंखें
मौन में सरणाट बजती है
उसकी सांस
मैं अकेला
डर से कांपता
कभी उसे देखता हूं
कभी हाथ में
इकट्ठा की हुई कविताओं को.


इंतजार
अब छोडिए भाईजी !
किसे परवाह है
आपके गुस्से की
इस दुनिया में.

मिल सको तो
एकमेक हो जाओ
इस मुखोटों वाली भीड़ में
या फ़िर
मेरी तरह
धार लो मौन
इस भरोसे
कि कभी तो आएगा कोई
मेरी पीड़ा परखने वाला
आए भले ही
आसमान से.


यकीन
तुमसे प्रेम करते वक्त
कब सोचा था मैंने
कि इस तरह
बिखर जाएगा
हमारे सपनों का संसार.

आज भी
याद के बहाने
मैं देख लेता हूं
मन के किसी कोने में
उस दुनिया के निशान.

मुझे यकीन है
कि तुम भी
कभी-कभार तो
जरूर संभालती होंगी
उस संचित सुख को
इसी तरह.


आओ तलाशें वे शब्द
वेद कहते हैं
इस सृष्टि में
अभी तक स्थिर है
वे शब्द
जिनसे रचे गए मंत्र
युगों की साधना से.

ओ मेरे सृजक !
आओ तलाशें
उन शब्दों को
पहचानें
उनके तेज को
उतारें
उन मंत्रों की आत्माओं को
हमारी कविता में
साधे संबध
उनकी गूंज से.

फ़िर देखना
हमारी कविता
कम नहीं होगी
किसी मंत्र से.


यादों का समुद्र
सचमुच
बहुत अच्छा लगता था
दोस्तों के साथ
तुमसे नेह का
बखान करते
सारी-सारी रात.

यह जुदा है
कि आज
मुंह पर लाना भी
पाप समझता हूं
वे कथाएं.

मगर मेरा मन
अब तक नहीं भूला है
उन यादों के समुद्र में
गोता खाने का सुख.


प्रीत के रंग
झूठ नहीं कहा गया है
कि प्रीत के
रंग होते है हजार.

उस वक्त की फ़िजां में
मैं सूंघता था
प्रीत की खुशबू
रातों रास करता
सपनों के आंगन
हृदय रचता
एक इन्द्रधनुष.

बदले हुए वक्त में
आज भी
मेरे सामने है
प्रीत के नए-निराले रंग
चित्र जरूर बदल गए हैं.

शायद
इस बेरंग होती दुनिया को
रंगीन देखने के लिए
जरूरी है
प्रीत रंगी आंखे.



मेरे हिस्से की चिंताएं
मुझे सवेरे उठते ही
चारपाई की दावण खींचनी है
पहली तारीख को अभी सतरह दिन बाकी है
पर बबलू की फ़ीस तो भरनी ही पड़ेगी.
पत्नी के साथ रिश्तदारी में हुई गमी पर जाना है
कल डिपो पर फ़िर मिलेगा केरोसीन तेल
मैंने यह भी सुना है कि
ताजमहल का रंग पीला पड़ रहा है इन दिनों
सिरहाने रखी किताब से मैंने
अभी आधी कविताएं ही पढ़ी है.


प्रेम पत्र : पांच चित्र

(एक)
तुम्हारा प्रेम पत्र
मैंने संभाल रखा है
ओरिये की संदूक में.

रोज सुबह देखता हूं
प्रीत की वह अनमोल निशानी
चाव से बांचता हूं
प्रेम के आखर
अचानक हरा हो जाता है
समय का सूखा ठूंठ
अंतर में उतरने लगती है
मधरी-मधरी महक.

तुम्हारा प्रेम पत्र
समुद्र बन जाता है
स्मृति के आंगन में.

(दो)
रेशमी रुमाल में लपेटकर
जिस तरह
तुमने मुझे सौंपा था
पहला प्रेम-पत्र
आज भी लगता है मुझे
सपना सरीखा.

कभी-कभार
एक सपने में ही
गुजर जाती है
समूची जिंदगानी.

(तीन)
तुम्हारे प्रेम पत्र में
अब तक बाकी है
तुम्हारे स्पर्श की सौरभ.

आखर की आरसी में
मैं चीन्हता हूं
तुम्हारा चेहरा.

प्रीत का पुराना पत्र
एक इतिहास है
अपने-आप में

(चार)
पुराना कागज
पोच गया
फ़ीका पड़ गया
आखरों का रंग
प्रीत की पहली पाती पर
जम गई
वक्त की गर्द.

किंतु आज भी है
तुम्हार इंतजार !


(पांच)
समझदारी है
फ़ाड़ कर जला देना
पुराने प्रेम-पत्रों को
जो चुगली कर सकते हैं
उस प्रेम की.

मगर कैसे मिटाऊं
मन की पाटी लिखे हुए
प्रीत के आखरों को
जो कविता के बहाने
खुदबखुद बताते रहते हैं
वे कथाएं.

अनुवाद : स्वयं
संपर्क- १४४, लढ़ा-निवास, महाजन, जिला- बीकानेर (राजस्थान), भारत
पिनकोड-३३४६०४ मो.-०९९८२५०२९६९
madanrajasthani@gmail.com

14 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

प्रिय मदन जी, आपकी कविताएं पढ़ीं। यूँ तो आपकी सभी कविताएं अच्छी लगीं पर "मेरे हिस्से की चिंताएं' कविता ने विशेश रूप से प्रभावित किया। आप राजस्थानी में लिख रहे हैं और स्वयं ही हिन्दी में अनुवाद कर रहे हैं, जानकर भी खुशी हुई, अपनी मां-बोली में लिखते यूँ ही लिखते रहें और हिन्दी के पाठकों तक हिन्दी अनुवाद के माध्यम से पहुंचते रहें। मेरी शुभकामनाएं !

सुभाष नीरव
www.setusahitya.blogspot.com
www.kathapunjab.blogspot.com
www.srijanyatra.blogspot.com
www.sahityasrijan.blogspot.com

Krishna Kumar Mishra ने कहा…

बहुत खूब

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी रचना। बधाई। ब्लॉग जगत में स्वागत।

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

नारदमुनि ने कहा…

---- चुटकी----

राहुल थके
प्रियंका ने
चलाई कार,
अब तो
यह भी है
टीवी लायक
समाचार।

suraj nahata ने कहा…

superb

suraj nahata ने कहा…

dear ladha ji as you know I am a big fan of your, and your 5 poems of love is relly superb. Thanks

alka sarwat ने कहा…

सच बता !
तुम्हारे मिलने का मतलब
कहीं मेरा खोना तो नहीं है.


नहर पहचानती है
अपनी हद
वह न तो नदी है
न ही समुद्र
सपना भी नहीं पालती.
आपकी कविताओं ने दिन भर की थकान मिटा दी ,शब्दकोष सबसे अच्छी लगी
मुबारक

janyfer ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
janyfer ने कहा…

hi madan g u r pome (YAKIN) really yakin,coz ye yakin har insaan ki life me ek baar kud-b-kud such hota hai.Dil ki aawaj hai YAKIN tanks alot.u r fan JANYFER.

janyfer ने कहा…

hello madan g roz aap ka blog padti hu. kuch na kuch esa milta hai jo heart ko chu jata hai or raha nahi jata aap ko comme. likhe bina so is baar (NAHAR) ke liye thankxxxxxxxxxxx.sayad NAHAR jesi me ya muz jesi NAHAR. u r fan janyfer.

AAPNI BHASHA - AAPNI BAAT ने कहा…

balle balle!

aadi ने कहा…

नमस्कार मदन जी...
वेसे तो मे ये सब बहुत पहले ही पढ़ चुका हू पर आज ब्लोग पर हिन्दी मे पढ़ कर अलग सा लगा...बहुत उमदा लेखन है आपका ...

गँगासागर सारस्वत ने कहा…

बहुत खूब ।
सभी कविताएँ ह्रदयस्पर्शी है ।