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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

चट्टानों की होड़ करते हौंसले



चट्टानों की होड़ करते हौंसले

मदन गोपाल लढ़ा

किसी ने सच ही कहा है कि हौंसले फ़तह की बुनियाद हुआ करते हैं. बीकानेर जिले के सूंई ग्राम का शिशुपाल सिंह इसकी मिसाल है. बुलंद हौंसलों के धनी शिशुपाल सिंह ने अपने जीवन से आदमी के जीवट को नई परिभाषा दी है. वर्षों पूर्व एक हादसे में रीढ़ की हड्डी टूट जाने के बावजूद उसने अपने मजबूत इरादों को नहीं टूटने दिया. वाकई उसकी जिन्दादिली को सजदा करने को जी करता है.
उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच महाजन से २५ किमी दूर बसे सूंई ग्राम का बासिन्दा शिशुपाल सिंह भरी जवानी में एक खतरनाक हादसे का शिकार हो गया. बीस वर्षों पुरानी बात रही होगीं. गांव मे बिजली चली गई. दो दिनों तक नहीं आई. बिजली महकमे के इकलौते कर्मचारी के भरोसे दस गांवों की बिजली व्यवस्था का जिम्मा था. एसी स्थिती में गांव के लोग ही फ़्यूज वगैरह डाल कर काम चलाते थे. जब दो दिनों तक विभाग का कोई आदमी बिजली की सुध लेने नहीं आया तो ग्रामीणों के कहने पर शिशुपाल सिंह फ़्यूज लगाने के लिए ट्रांसमीटर पर चढ़ा लेकिन करंट के जोरदार झटके से वह जमीन पर गिर पड़ा व उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई. अब शिशुपाल सिंह की उम्र ६५ वर्ष की है. बीते बीस वर्षों से वह लकडी की खाट पर सीधा लेटा है. खुद करवट बदलना भी संभव नहीं है. यद्यपि इस दुर्घटना ने उसके शरीर को अपंग बना दिया लेकिन उसके विचार अटल-अडिग है.
खाट पर लेटे-लेटे ही शिशुपाल सिंह ने जीने का एसा मकसद तलाश लिया है जो भले चंगे लोग भी नहीं तलाश पाते. शिशुपाल सिंह ने अपने पास एक लाउडस्पीकर मंगा रखा है जिससे वह रोजाना पूरे गांव को अखबार बांच कर सुनाता है. साधन- सुविधाओं से वंचित इस गांव में ४-५ घरों में अखबार आता है, वह भी ११ बजे आने वाली इकलौती बस में, मगर शिशुपाल सिंह के प्रयासों से पूरा गांव देश-दुनिया की सुर्खियां जान जाता है. तभी तो लोग इस अनोखे समाचार-वाचक के न्यूज बुलेटिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं. इतना ही नहीं किसी के घर जागरण हो या किसी का पशु खो जाए, गांव वालों को इसकी सूचना शिशुपाल सिंह के जरिये ही पहुंचती है. ग्राम में ग्रामसेवक या पटवारी या टीकाकरण के लिये नर्स के आने की खबर भी शिशुपाल सिंह के रेडियो से ही प्रसारित होती है.
हालांकि शिशुपाल सिंह के लिए चलना-फ़िरना तो दूर खुद करवट बदलना भी मुम्किन नहीं, मगर उसके चेहरे पर दैन्यता की छाया तक नहीं दिखती है. उसका बात-बात पर खिलखिला कर हंसना तथा चेहरे का चमकता ओज उसके चट्टानों सरीखे हौंसलों को बयां करते जान पड़ते हैं

आलेख- मदन गोपाल लढ़ा
छाया- लूणाराम वर्मा

9 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

सूंईँ गांव रा शिशुपाल जी री कथा, व्यथा सूं लूंठी।बां री हूंस नै लखदाद।शिशुपाल जी रो मांचो तो सूंई रो सूचना केन्द्र है।शिशुपाल जी पकड़ राखी है खाट पण गांव मेँ कर राख्या है ठाट। वा सा!वा लड्ढ़ा जी,वा !रचनात्मकता है आ !अंवेरो अर रचो!सूचना क्रांति रै इण जुग मेँ भोत कीँ हाल है अदीठ ।
इण अंवेरू रपट सारु बधायजै!

दुलाराम सहारण ने कहा…

शिशुपालजी सूं परिचय करावणो आपरी डूंगी दीठ रो परिणाम है। इस्‍या पात्रां सूं परिचै होवणो हिम्‍मत मांय बधेपो होवणो है।


शिशुपालजी री हूंस नै लखदाद

आपनै लखदाद

vnokhwal ने कहा…

Lakhdad hai ada minkha ne jaka aapri apanganta mathe aansu talkavan ri jegya samaj re bhale man pran sinche. aalekh saru badhe.
VINOD NOKHWAL
chief editor,
maru shabdankan, PILIBANGAN

VINOD NOKHWAL ने कहा…

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VINOD NOKHWAL
chief editor,
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डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

शिशुपाल सिंह की जीवटता को प्रणाम !

Kumar Ajay ने कहा…

एक अच्छे आलेख के लिए बधाई...

Jitendra Bagria ने कहा…

सोच नहीं प् रहा की क्या लिखा जाए पर... बहुत खूब !!!