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गुरुवार, 1 सितंबर 2011

सामने वाली स्त्री


गुजराती कहानी

सामने वाली स्त्री

मूल - हिमांशी शेलत

माया हांफती हुई डिब्बे में दाखिल हुई। हाथ में भार होने के कारण ही सही उसे एक सप्ताह में तीसरी बार ऎसा लगा कि थोड़ा वजन कम करना होगा। खुद के बारे में इतनी लापरवाही ठीक नहीं। वक्त मिले कि नहीं मिले, तब भी चलना पड़ता है, कसरत करनी पड़ती है...कान के पास छूटी लट को पिन में फंसाने की कोशिश करते हुए उसे ध्यान आया कि आज फिर पिन लगाना भूल गई। अब सफर में लटें उड़ती ही रहेंगी। उसे खुद पर गुस्सा आया। ऎसे ही वापी पहुंच जाती कि तभी उसका ध्यान भंग करता एक सवाल एकाएक उसके सामने आकर खड़ा हो गया।- मुंबई जा रही हैं आप?सामने देखा। पूरा खिला हुआ, सुख से धुला और सुख की बूंदों से दिपदिपाता चेहरा। गालों की सुर्खी, होंठों का गुलाबीपन, चमकते रेशमी बाल और चेहरे के अनुरूप मेक-अप। ड्रेस भी चालू नहीं, सफेद टी-शर्ट और लम्बा आसमानी स्कर्ट। बेग-पर्स सब कीमती और इस देश के नहीं लगते जैसे। उसके चुस्त शरीर में से आती सुगन्ध किसी महंगे परफ्यूम की होगी। विदेश में ही रहती होगी यह। निश्चित रूप से अमरीका में। माया अपनी तरफ आए सवाल का जवाब देते-देते सामने वाली स्त्री को देखती रही।- नहीं, मुंबई नहीं, वापी।उसके बाद कुछ पल दोनों महिलाएं खिड़की में से बाहर देखती रहीं। ट्रेन चली तब वे चारों आंखें एक घड़ी अंदर एक घड़ी बाहर आती-जाती रहीं। प्लेटफार्म के कोलाहल की गूंज से जब डिब्बा बाहर निकला तब जरा हवा आई।- उफ...मुझसे यहां की गर्मी सहन नहीं होती। अनुमान सच्चा। परदेश से ही आई हैं।- आप वापी में ही रहती हैं?माया को लगा कि परदेश रहे चाहे देश में, पंचायती तो एक जात की करती है। अब क्या कहुं इसे?- हां, वापी में।उससे ऎसे ही बोला गया। न ज्यादा न कम। फिर मान- सत्कार के रूप में उसने भी सामने वाली स्त्री से पूछ लिया।- आप कहां...अमरीका से?- हां, दस वष्ाोü से केलिफोर्निया हूं...मम्मी से मिलने आई हूं। बहुत बीमार है.... बड़ी बहन नवसारी रहती है। उसी से मिलने जा रही हूं। कल वापस वडोदरा।बात आगे नहीं बढ़े इसलिए माया ने पर्स में से एक किताब निकाली और ऎसी अधीरता से एक पन्ना खोलकर सिर झुका लिया जैसे उसे पढ़ने में बहुत मजा आ रहा हो। ऎसा करते हुए भी सामने बैठी स्त्री का निरीक्षण चालू ही रहा। माया ने गुपचुप देख ही लिया कि उस महिला ने अपना मोटा पर्स अपनी गोद में रखा था।वह उसमें कुछ ढंूढ़ रही थी। पर्स में आम तौर पर जो निकलना चाहिए, उससे ज्यादा ही निकला। डायरी, हेयर-ब्ा्रश, लिपस्टिक, रूमाल, कागज, पांच-दस सिक्के इन सबको अलग करती हुई वह अपनी तलाश में खोयी हुई थी। उसकी अंगुठियां सुंदर थी, नाखुन रंगे हुए और दो अंगुठियां पहनी हुई। बाहर निकाले हुए सामान से भी खुशबू आ रही थी। तभी खिड़की में से पवन का एक झौंका आया और उसके साथ ही गोद में पड़ा एक लिफाफा उड़ गया। ओह... आउच...जैसा माया ने सुना और उसने अपने करीब आकर गिरा लिफाफा उठाकर उसे पहली स्त्री को दे दिया।- थैन्क्यू।माया केवल हंसीं। सामने वाली स्त्री लिफाफा पर्स में डाल रही थी, तभी मानो उसे कुछ याद आया, उसने लिफाफे में से तीन फोटो निकाले। पहले उसने खुद देखे, फिर माया के सामने रख दिए।- साथ ही रखती हूं। मेरा सन और हसबेन्ड....फोटो रख दिए तो शिष्टाचारवश देखना पड़ा। माया ने किताब बंद की, निशान रखने के लिए पृष्ठ मोड़ा और फोटो हाथ में लिए। अमरीका में हो ऎसा घर और अमरीका में हो ऎसा वर। चमकदार कपड़े, पीछे झूला, सफेद फूलों की क्यारी, दो बड़े पेड़, हरी-भरी पहाड़ी से नीचे जाता रास्ता, महंगी सफेद कार और नजदीक बॉल लेकर खड़ा गोलमटोल लड़का। सातेक वष्ाोü का होगा....एकदम व्यवस्थित, रंगीन और मुलायम सुख।- सरस है।माया को लगा कि इतना तो कहना ही चाहिए, खासकर जब एक अनजान महिला अपने सुख को बताने के लिए उत्सुक हो। ऎसा लगा जैसे सामने वाली स्त्री खुश हो गई हो।- मैं तो उन दोनों को छोड़कर आती ही नहीं। इन दिनों विक्रम को वहां बहुत काम था इसलिए रोनक को उसके पास छोड़कर मैं आ गई।अब माया का भी बातों का मन हुआ। बात आगे चल पड़ी।- आप भी वहां नौकरी करती हैं?- ओह....नो...नो...विक्रम के वहां तीन बड़े स्टोर्स हैं। रोनक के जन्म से पहले एक आध वष्ाü नौकरी की थी। फिर तो यूं ही...मौज ही कर रही हूं।वह फिर हंसी। सुखी लोग ऎसे ही हंसते रहते हैं। बार-बार। उसके दांत सुन्दर हैं। एक सरीखे और सफेद। जो विदेश रहते हैं उनके दांत अधिक सफेद होते हैं? माया पल भर उसे तो पल भर खिड़की से बाहर देखती रही। बाहर बादलों ने घेरा बना लिया था। वापी पहुंचते-पहुंचते बारिश शुरू हो जाएगी। खड्डेदार गंदा रास्ता....- आप वापी में नौकरी करती हैं?माया ने इस सवाल का अपनी तरफ आता देखा जरूर लेकिन जवाब देने में जल्दबाजी नहीं की। खिड़की के बाहर बादलों की काली छाया के नीचे से हरे-भरे खेत के बीच में बना एक छोटा-सा घर गुजर गया। ऎसा लगा जैसे उसके आंगन के पीले फूलों का रंग हवा में उड़ा हो। वहां पास में एक मोर टहल रहा था या फिर कुछ और?- वापी में हमारा फार्म है। थोड़ी खेती, थोड़े आम और चीकू....केलों की छोटी सी बाड़ी है।- वाउ...मस्ट बी नाईस....- हां, बहुत सरस जगह हैं। शांत...जहां रहने का मन करे।- आपके कोई बेटा-बेटी?- नहीं, केवल हम दो...फार्म पर जो लोग काम करते हैं, वही हमारा कुटुम्ब।माया बेधड़क बोल गई। कहीं कुछ हिचकिचाहट नहीं।- टाइम पास हो जाता है ठीक से? आई मीन गांवों में सोश्यल लाइफ जैसा कुछ नहीं होता है ना...- देखो ना, शनि-रवि तो हम आस-पास कहीं चले जाते हैं। बहुत खूबसूरत स्थान हैं, बोरडी या उमरगाम या फिर खानवेल...और आम दिनों में फार्म और बगीचे में कामकाज...मुझे गार्डनिंग का शौक है....अब भी कुछ बाकी जानकर माया लगातार बोलती गई।- सप्ताह में दो दिन म्यूजिक क्लास में जाना होता है। रियाज में भी काफी वक्त निकल जाता है। मेरे हसबेन्ड धीरेन को...बहुत शौक है क्लासिक का....- ओह इट्स वैरी इंटरेस्टिंग....बादलों की घटा गहरी हो गई थी। डिब्बे में भी अंधेरा छाने लगा था। माया ने किताब बंद कर दी। बाहर दरख्त और आदमकद घास जैसे झुक रहे थे, उससे हवा की प्रचंड ताकत का अंदाजा लग रहा था। हवा आज सब बराबर करके ही छोड़ेगी। माया ने आराम से बैठने के विचार से पांव ऊपर करके पालथी लगा ली।- मुझे तो बड़ी बहन के नए घर का पता भी नहीं। आई हेव द फोन नम्बर...वे लोग हाल ही में शिफ्ट हुए हैं इसलिए....- आपको लेने तो आएगा ना कोई?- या ....कल ही बात हुई फोन पर। स्टेशन पर कोई आ जाएगा। मैं वहां की लाइफ स्टाइल की ऎसी आदी हो गई हूं कि सफर में नर्वस हो जाती हूं...घबराहट-सी होने लगती है।माया कुछ नहीं बोली। उसमें बोलने जैसा कुछ था भी नहीं।बातचीत थम गई।बाहर फुहारें शुरू हो गई। ऎसी बरसात माया को बहुत अच्छी लगती है। मगर फुहारें कभी भी मूसलाधार बारिश में बदल सकती है। इस चिंता में वह अपना सामान देखने लगी।- मेरा बेटा तो कहता है कि मोम आप ट्रेन में ट्रेवल करेंगी तो बीमार पड़ जाएंगी। आते-जाते लोग यहां की बीमारियों खासकर मलेरिया की बातें करते रहते हैं इसलिए उसको लगता है कि इंडिया में तो लोग बीमार ही रहते हैं।- आपका लड़का यहां आया है कभी?- नहीं, एक बार भी नहीं। उसने तो इंडिया देखा तक नहीं। उसका मन ही नहीं होता आने का....- यू मस्ट बी मिसिंग हिम वैरी मच.....माया डिब्बे में बैठने के बाद पहली बार अंग्रेजी में बोली।- या, वैरी मच....सामने वाली स्त्री केवल इतना कहकर अपनी दुनिया में खो गई। शायद विक्रम और रोनक की उपस्थिति अनुभव कर रही होगी...माया ने कल्पना में उसे उन दोनों के साथ हाथ में हाथ डाले खड़े देखा। फिर उसकी नजरों से नजरें मिली तो माया हंस पड़ी। वह भी हंसी। संतोष्ा, आनन्द, सलामती और शांति छलछला रहा था। यह सब छलका और चारों तरफ बहने लगा।तभी माया को याद आया कि अभी तक उसने सामने वाली स्त्री की बीमार मम्मी के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। यह तो बिलकुल अविवेक ही गिना जाएगा।
- आपकी बा को क्या हुआ है
हार्ट ट्रबल, हाईपर टेन्शन। मेरी तो इच्छा होती है कि मम्मी को वहीं ले जाऊं, परन्तु यहां भाई नहीं मानता। असल में तो मम्मी भी आना नहीं चाहती। कहती है कि मुझे अच्छा नहीं लगता। सभी सगे-सम्बन्धी जो यहां हैं।
- सही बात है उनकी। जहां रहे हों, बुढ़ापे में वहीं अच्छा लगता है।वह ऎसे बोली जैसे डब्बे के अंदर कहीं लिखे सूत्र को पढ़ रही हो।एक छोटा स्टेशन तेजी से निकल गया। दो-तीन जनों ने खड़े होकर सामान संभाला और दरवाजे की तरफ जाने की तैयारी करने लगे। शायद नवसारी आने वाला था।
- लीजिए, आपका स्टेशन आ गया।सामने वाली स्त्री ने बेग-पर्स लिए, टी-शर्ट खींच कर ठीक की। बालों में अंगुलियां फेरी, नजाकत से।- चलो, बाय...थैंक्स फॉर योर कम्पनी....वह नीचे खड़ी रही तभी भीड़ में उसके सामने एक हाथ हिला।माया ने देखा कि उसे लेने शायद उसकी बड़ी बहन आई थी। दोनों मिलीं और मिलते हुए शायद रोई भी। हो सकता है ऎसा न भी हो। दूर से ऎसा लगा हो। बारिश का जोर बढ़ गया था। वापी तक तो झमाझम होने लगेगी। वापी में तकलीफ होगी। बडे बेग में सिलाई कार्य के कुछ नमूने थे। ऑर्डर देने के लिए व्यापारी ने कुछ नमूने मांगे थे। पसंद आ जाए तो अच्छा काम मिल जाए। ठेठ पैंदे तक पहुंची उपेक्षा और पीड़ा का भान होते हुए भी माया ने जरा मस्ती महसूस की। कितनी आसानी से उसने खुद को धीरेन के फार्म हाउस में फिट कर दिया! बाकी धीरेन के पास अब फार्म है अथवा नहीं, किसे खबर है! उसने विवाह किया है या नहीं, इसका भी क्या पता! यह तो वष्ाोü पुरानी एक सुबह आज फिर उसकी जिन्दगी में उग आई थी। उस सुबह धीरेन उसको देखने आने वाला था...नहीं...उन दोनों की मुलाकात तय हुई थी, और अगर धीरेन को वह पसंद आ जाती तो दोनों की शादी-बाकी सब कुछ तो तय ही था।यह अलग बात है कि उसे धीरेन बहुत पसंद आया था। बी.ए. करने के बाद जब उसे अच्छी नौकरी नहीं मिली तब अपनी पसंद के सबसे आखिरी क्रम का सिलाई कार्य करना पड़ा। उसकी नाकामियों की सूची में धीरेन के अलावा भी बहुत कुछ था और यह सूची लम्बी होती जा रही थी।फार्म हाउस और धीरेन को एक तरफ रख कर माया ने वापी के बारे में सोचा। सिंधी व्यापारी का ठिकाना दूर है इसलिए रिक्शा करना पड़ेगा। बौछारों से बचने के लिए उसने खिड़की का कांच नीचे खींच दिया। फिर भी दुपट्टा भीग ही गया। उसने दुपट्टे को जरा खींचकर फटकारा और मुंह के आगे करके लहराया ताकि जल्दी से सूख जाए।

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बड़ी बहन ने उसके कंधों को थपथपाया और अपने पुष्ट हाथों से उसे बाहों में भर लिया। रूमाल से उसकी आंखें पूंछी, गाल पर अंगुलियां फेरी, पौर गीले हो गए।- कोई न कोई रास्ता निकलेगा। हम हैं ना। रोनक को यहीं रखूंगी। यहीं पढ़ेगा। चिंता मत कर।उसकी आवाज भारी हो गई। मुश्किल से बोल पाई।- मगर विक्रम माने तब ना। मैं नहीं जानती रोनक को यहां अच्छा लगेगा या नहीं लेकिन इतना तय है कि मैं अब वहां नहीं रह सकती।- ऎसा कुछ नहीं है। वहां भी महिलाएं अकेली रहती होंगी। तलाक तो वहां बहुत कॉमन है, है ना?- है, मगर मुझे वहां रहना ही नहीं...- हमें क्या पता कि विक्रम ऎसा.....बड़ी बहन का वाक्य अधूरा ही रहा, क्योंकि वह लगातार रोए जा रही थी...जैसे रूकेगी ही नहीं।
कार से दौड़कर आए ड्राइवर ने छतरी खोलकर उसके ऊपर लगा दी।

अनुवाद -डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

1 टिप्पणी:

Sanjay Solanki ने कहा…

महाशय अनुवाद अच्छा कर लेते है आप.