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गुरुवार, 1 सितंबर 2011

सामने वाली स्त्री


गुजराती कहानी

सामने वाली स्त्री

मूल - हिमांशी शेलत

माया हांफती हुई डिब्बे में दाखिल हुई। हाथ में भार होने के कारण ही सही उसे एक सप्ताह में तीसरी बार ऎसा लगा कि थोड़ा वजन कम करना होगा। खुद के बारे में इतनी लापरवाही ठीक नहीं। वक्त मिले कि नहीं मिले, तब भी चलना पड़ता है, कसरत करनी पड़ती है...कान के पास छूटी लट को पिन में फंसाने की कोशिश करते हुए उसे ध्यान आया कि आज फिर पिन लगाना भूल गई। अब सफर में लटें उड़ती ही रहेंगी। उसे खुद पर गुस्सा आया। ऎसे ही वापी पहुंच जाती कि तभी उसका ध्यान भंग करता एक सवाल एकाएक उसके सामने आकर खड़ा हो गया।- मुंबई जा रही हैं आप?सामने देखा। पूरा खिला हुआ, सुख से धुला और सुख की बूंदों से दिपदिपाता चेहरा। गालों की सुर्खी, होंठों का गुलाबीपन, चमकते रेशमी बाल और चेहरे के अनुरूप मेक-अप। ड्रेस भी चालू नहीं, सफेद टी-शर्ट और लम्बा आसमानी स्कर्ट। बेग-पर्स सब कीमती और इस देश के नहीं लगते जैसे। उसके चुस्त शरीर में से आती सुगन्ध किसी महंगे परफ्यूम की होगी। विदेश में ही रहती होगी यह। निश्चित रूप से अमरीका में। माया अपनी तरफ आए सवाल का जवाब देते-देते सामने वाली स्त्री को देखती रही।- नहीं, मुंबई नहीं, वापी।उसके बाद कुछ पल दोनों महिलाएं खिड़की में से बाहर देखती रहीं। ट्रेन चली तब वे चारों आंखें एक घड़ी अंदर एक घड़ी बाहर आती-जाती रहीं। प्लेटफार्म के कोलाहल की गूंज से जब डिब्बा बाहर निकला तब जरा हवा आई।- उफ...मुझसे यहां की गर्मी सहन नहीं होती। अनुमान सच्चा। परदेश से ही आई हैं।- आप वापी में ही रहती हैं?माया को लगा कि परदेश रहे चाहे देश में, पंचायती तो एक जात की करती है। अब क्या कहुं इसे?- हां, वापी में।उससे ऎसे ही बोला गया। न ज्यादा न कम। फिर मान- सत्कार के रूप में उसने भी सामने वाली स्त्री से पूछ लिया।- आप कहां...अमरीका से?- हां, दस वष्ाोü से केलिफोर्निया हूं...मम्मी से मिलने आई हूं। बहुत बीमार है.... बड़ी बहन नवसारी रहती है। उसी से मिलने जा रही हूं। कल वापस वडोदरा।बात आगे नहीं बढ़े इसलिए माया ने पर्स में से एक किताब निकाली और ऎसी अधीरता से एक पन्ना खोलकर सिर झुका लिया जैसे उसे पढ़ने में बहुत मजा आ रहा हो। ऎसा करते हुए भी सामने बैठी स्त्री का निरीक्षण चालू ही रहा। माया ने गुपचुप देख ही लिया कि उस महिला ने अपना मोटा पर्स अपनी गोद में रखा था।वह उसमें कुछ ढंूढ़ रही थी। पर्स में आम तौर पर जो निकलना चाहिए, उससे ज्यादा ही निकला। डायरी, हेयर-ब्ा्रश, लिपस्टिक, रूमाल, कागज, पांच-दस सिक्के इन सबको अलग करती हुई वह अपनी तलाश में खोयी हुई थी। उसकी अंगुठियां सुंदर थी, नाखुन रंगे हुए और दो अंगुठियां पहनी हुई। बाहर निकाले हुए सामान से भी खुशबू आ रही थी। तभी खिड़की में से पवन का एक झौंका आया और उसके साथ ही गोद में पड़ा एक लिफाफा उड़ गया। ओह... आउच...जैसा माया ने सुना और उसने अपने करीब आकर गिरा लिफाफा उठाकर उसे पहली स्त्री को दे दिया।- थैन्क्यू।माया केवल हंसीं। सामने वाली स्त्री लिफाफा पर्स में डाल रही थी, तभी मानो उसे कुछ याद आया, उसने लिफाफे में से तीन फोटो निकाले। पहले उसने खुद देखे, फिर माया के सामने रख दिए।- साथ ही रखती हूं। मेरा सन और हसबेन्ड....फोटो रख दिए तो शिष्टाचारवश देखना पड़ा। माया ने किताब बंद की, निशान रखने के लिए पृष्ठ मोड़ा और फोटो हाथ में लिए। अमरीका में हो ऎसा घर और अमरीका में हो ऎसा वर। चमकदार कपड़े, पीछे झूला, सफेद फूलों की क्यारी, दो बड़े पेड़, हरी-भरी पहाड़ी से नीचे जाता रास्ता, महंगी सफेद कार और नजदीक बॉल लेकर खड़ा गोलमटोल लड़का। सातेक वष्ाोü का होगा....एकदम व्यवस्थित, रंगीन और मुलायम सुख।- सरस है।माया को लगा कि इतना तो कहना ही चाहिए, खासकर जब एक अनजान महिला अपने सुख को बताने के लिए उत्सुक हो। ऎसा लगा जैसे सामने वाली स्त्री खुश हो गई हो।- मैं तो उन दोनों को छोड़कर आती ही नहीं। इन दिनों विक्रम को वहां बहुत काम था इसलिए रोनक को उसके पास छोड़कर मैं आ गई।अब माया का भी बातों का मन हुआ। बात आगे चल पड़ी।- आप भी वहां नौकरी करती हैं?- ओह....नो...नो...विक्रम के वहां तीन बड़े स्टोर्स हैं। रोनक के जन्म से पहले एक आध वष्ाü नौकरी की थी। फिर तो यूं ही...मौज ही कर रही हूं।वह फिर हंसी। सुखी लोग ऎसे ही हंसते रहते हैं। बार-बार। उसके दांत सुन्दर हैं। एक सरीखे और सफेद। जो विदेश रहते हैं उनके दांत अधिक सफेद होते हैं? माया पल भर उसे तो पल भर खिड़की से बाहर देखती रही। बाहर बादलों ने घेरा बना लिया था। वापी पहुंचते-पहुंचते बारिश शुरू हो जाएगी। खड्डेदार गंदा रास्ता....- आप वापी में नौकरी करती हैं?माया ने इस सवाल का अपनी तरफ आता देखा जरूर लेकिन जवाब देने में जल्दबाजी नहीं की। खिड़की के बाहर बादलों की काली छाया के नीचे से हरे-भरे खेत के बीच में बना एक छोटा-सा घर गुजर गया। ऎसा लगा जैसे उसके आंगन के पीले फूलों का रंग हवा में उड़ा हो। वहां पास में एक मोर टहल रहा था या फिर कुछ और?- वापी में हमारा फार्म है। थोड़ी खेती, थोड़े आम और चीकू....केलों की छोटी सी बाड़ी है।- वाउ...मस्ट बी नाईस....- हां, बहुत सरस जगह हैं। शांत...जहां रहने का मन करे।- आपके कोई बेटा-बेटी?- नहीं, केवल हम दो...फार्म पर जो लोग काम करते हैं, वही हमारा कुटुम्ब।माया बेधड़क बोल गई। कहीं कुछ हिचकिचाहट नहीं।- टाइम पास हो जाता है ठीक से? आई मीन गांवों में सोश्यल लाइफ जैसा कुछ नहीं होता है ना...- देखो ना, शनि-रवि तो हम आस-पास कहीं चले जाते हैं। बहुत खूबसूरत स्थान हैं, बोरडी या उमरगाम या फिर खानवेल...और आम दिनों में फार्म और बगीचे में कामकाज...मुझे गार्डनिंग का शौक है....अब भी कुछ बाकी जानकर माया लगातार बोलती गई।- सप्ताह में दो दिन म्यूजिक क्लास में जाना होता है। रियाज में भी काफी वक्त निकल जाता है। मेरे हसबेन्ड धीरेन को...बहुत शौक है क्लासिक का....- ओह इट्स वैरी इंटरेस्टिंग....बादलों की घटा गहरी हो गई थी। डिब्बे में भी अंधेरा छाने लगा था। माया ने किताब बंद कर दी। बाहर दरख्त और आदमकद घास जैसे झुक रहे थे, उससे हवा की प्रचंड ताकत का अंदाजा लग रहा था। हवा आज सब बराबर करके ही छोड़ेगी। माया ने आराम से बैठने के विचार से पांव ऊपर करके पालथी लगा ली।- मुझे तो बड़ी बहन के नए घर का पता भी नहीं। आई हेव द फोन नम्बर...वे लोग हाल ही में शिफ्ट हुए हैं इसलिए....- आपको लेने तो आएगा ना कोई?- या ....कल ही बात हुई फोन पर। स्टेशन पर कोई आ जाएगा। मैं वहां की लाइफ स्टाइल की ऎसी आदी हो गई हूं कि सफर में नर्वस हो जाती हूं...घबराहट-सी होने लगती है।माया कुछ नहीं बोली। उसमें बोलने जैसा कुछ था भी नहीं।बातचीत थम गई।बाहर फुहारें शुरू हो गई। ऎसी बरसात माया को बहुत अच्छी लगती है। मगर फुहारें कभी भी मूसलाधार बारिश में बदल सकती है। इस चिंता में वह अपना सामान देखने लगी।- मेरा बेटा तो कहता है कि मोम आप ट्रेन में ट्रेवल करेंगी तो बीमार पड़ जाएंगी। आते-जाते लोग यहां की बीमारियों खासकर मलेरिया की बातें करते रहते हैं इसलिए उसको लगता है कि इंडिया में तो लोग बीमार ही रहते हैं।- आपका लड़का यहां आया है कभी?- नहीं, एक बार भी नहीं। उसने तो इंडिया देखा तक नहीं। उसका मन ही नहीं होता आने का....- यू मस्ट बी मिसिंग हिम वैरी मच.....माया डिब्बे में बैठने के बाद पहली बार अंग्रेजी में बोली।- या, वैरी मच....सामने वाली स्त्री केवल इतना कहकर अपनी दुनिया में खो गई। शायद विक्रम और रोनक की उपस्थिति अनुभव कर रही होगी...माया ने कल्पना में उसे उन दोनों के साथ हाथ में हाथ डाले खड़े देखा। फिर उसकी नजरों से नजरें मिली तो माया हंस पड़ी। वह भी हंसी। संतोष्ा, आनन्द, सलामती और शांति छलछला रहा था। यह सब छलका और चारों तरफ बहने लगा।तभी माया को याद आया कि अभी तक उसने सामने वाली स्त्री की बीमार मम्मी के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। यह तो बिलकुल अविवेक ही गिना जाएगा।
- आपकी बा को क्या हुआ है
हार्ट ट्रबल, हाईपर टेन्शन। मेरी तो इच्छा होती है कि मम्मी को वहीं ले जाऊं, परन्तु यहां भाई नहीं मानता। असल में तो मम्मी भी आना नहीं चाहती। कहती है कि मुझे अच्छा नहीं लगता। सभी सगे-सम्बन्धी जो यहां हैं।
- सही बात है उनकी। जहां रहे हों, बुढ़ापे में वहीं अच्छा लगता है।वह ऎसे बोली जैसे डब्बे के अंदर कहीं लिखे सूत्र को पढ़ रही हो।एक छोटा स्टेशन तेजी से निकल गया। दो-तीन जनों ने खड़े होकर सामान संभाला और दरवाजे की तरफ जाने की तैयारी करने लगे। शायद नवसारी आने वाला था।
- लीजिए, आपका स्टेशन आ गया।सामने वाली स्त्री ने बेग-पर्स लिए, टी-शर्ट खींच कर ठीक की। बालों में अंगुलियां फेरी, नजाकत से।- चलो, बाय...थैंक्स फॉर योर कम्पनी....वह नीचे खड़ी रही तभी भीड़ में उसके सामने एक हाथ हिला।माया ने देखा कि उसे लेने शायद उसकी बड़ी बहन आई थी। दोनों मिलीं और मिलते हुए शायद रोई भी। हो सकता है ऎसा न भी हो। दूर से ऎसा लगा हो। बारिश का जोर बढ़ गया था। वापी तक तो झमाझम होने लगेगी। वापी में तकलीफ होगी। बडे बेग में सिलाई कार्य के कुछ नमूने थे। ऑर्डर देने के लिए व्यापारी ने कुछ नमूने मांगे थे। पसंद आ जाए तो अच्छा काम मिल जाए। ठेठ पैंदे तक पहुंची उपेक्षा और पीड़ा का भान होते हुए भी माया ने जरा मस्ती महसूस की। कितनी आसानी से उसने खुद को धीरेन के फार्म हाउस में फिट कर दिया! बाकी धीरेन के पास अब फार्म है अथवा नहीं, किसे खबर है! उसने विवाह किया है या नहीं, इसका भी क्या पता! यह तो वष्ाोü पुरानी एक सुबह आज फिर उसकी जिन्दगी में उग आई थी। उस सुबह धीरेन उसको देखने आने वाला था...नहीं...उन दोनों की मुलाकात तय हुई थी, और अगर धीरेन को वह पसंद आ जाती तो दोनों की शादी-बाकी सब कुछ तो तय ही था।यह अलग बात है कि उसे धीरेन बहुत पसंद आया था। बी.ए. करने के बाद जब उसे अच्छी नौकरी नहीं मिली तब अपनी पसंद के सबसे आखिरी क्रम का सिलाई कार्य करना पड़ा। उसकी नाकामियों की सूची में धीरेन के अलावा भी बहुत कुछ था और यह सूची लम्बी होती जा रही थी।फार्म हाउस और धीरेन को एक तरफ रख कर माया ने वापी के बारे में सोचा। सिंधी व्यापारी का ठिकाना दूर है इसलिए रिक्शा करना पड़ेगा। बौछारों से बचने के लिए उसने खिड़की का कांच नीचे खींच दिया। फिर भी दुपट्टा भीग ही गया। उसने दुपट्टे को जरा खींचकर फटकारा और मुंह के आगे करके लहराया ताकि जल्दी से सूख जाए।

** *** *** ***
बड़ी बहन ने उसके कंधों को थपथपाया और अपने पुष्ट हाथों से उसे बाहों में भर लिया। रूमाल से उसकी आंखें पूंछी, गाल पर अंगुलियां फेरी, पौर गीले हो गए।- कोई न कोई रास्ता निकलेगा। हम हैं ना। रोनक को यहीं रखूंगी। यहीं पढ़ेगा। चिंता मत कर।उसकी आवाज भारी हो गई। मुश्किल से बोल पाई।- मगर विक्रम माने तब ना। मैं नहीं जानती रोनक को यहां अच्छा लगेगा या नहीं लेकिन इतना तय है कि मैं अब वहां नहीं रह सकती।- ऎसा कुछ नहीं है। वहां भी महिलाएं अकेली रहती होंगी। तलाक तो वहां बहुत कॉमन है, है ना?- है, मगर मुझे वहां रहना ही नहीं...- हमें क्या पता कि विक्रम ऎसा.....बड़ी बहन का वाक्य अधूरा ही रहा, क्योंकि वह लगातार रोए जा रही थी...जैसे रूकेगी ही नहीं।
कार से दौड़कर आए ड्राइवर ने छतरी खोलकर उसके ऊपर लगा दी।

अनुवाद -डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

शनिवार, 25 जून 2011

फ़ोटो एलबम देखते हुए

फ़ोटो एलबम देखते हुए

-मदन गोपाल लढ़ा-






श्वेत-श्याम चित्र् में
छुपे हुए हैं
कितने सारे रंग ।
देखते ही देखते
हरी हो जाती है याद
चेहरा सुर्ख गुलाबी
चमकने लगता है
आँखों का नीलापन ।
कहाँ से उतर आता है
रंगों का इंद्रधनुष
जब भी देखता हूँ
पुराना एलबम ।


2.
कसम से
मैं ही हूँ ये
यकीन नहीं हो रहा
पढो
फोटो के पीछे लिखा है
मेरा नाम
नाम के नीचे दिनांक
सचमुच
तब ऐसा ही लगता था
मैं ।
आइने में झाँकते हुए
पूछता हूँ खुद से
आखिर क्यों बदल गया इतना
सहसा
खुद को नहीं हुआ यकीन
अपना फोटो देखकर
पुराने एलबम में ।


3.
मानो थम-सा गया हो
वक्त का पहिया
या कोई खींच रहा है
पीछे
समय की सूई ।
अचंभित हूँ मैं
कैसे पहुँच गया
फिर उसी घडी में
जब उतारी थी फोटो
पुराने घर की बाखल में
दादा-दादी के साथ
हम तीनों भाई-बहन
यस
स्माइल प्लीज
ओ.के. !
क्लिक की आवाज के साथ
कैमरे में कैद हो गया
वह पल ।
चौंक उठता हूँ
क्या यह सपना है ?
गर सपना भी है
तो कितना सुहाना है !


4.
बेटा कहता है
ये मेरे पापा हैं
देखो कैसे लगते हैं
बिलकुल मेरे जैसे ।
बीवी चाव से दिखाती है
किटी पार्टी की महिलाओं को
पुराना एलबम
लजाकर कहती है -
‘ये उनकी फोटो है
कितने मासूम लगते हैं।’
मगर अम्मा चुप है
फोटो देखकर भी
नहीं फूटते उसके बोल
सोचती है
जो दिखता है फोटो में
अब कहाँ है वह ?

5.
बाइस लडके व सात लडकियाँ
बीच में गुरुजन
बी.ए. फाइनल इयर की
विदाई के मौके
खिंचवाया था यह ग्रुप फोटो ।
वक्त की गर्द ने
फोटो के साथ
धुंधला दिया है स्मृतियों को ।
मैं बताता हूँ चाव से
एक-एक सहपाठी का नाम
याद करके
बरबस ही ठहर जाता हूँ
उस चेहरे पर आकर
जिसे ताक रहा हूँ मैं
फोटो में भी ।
जानबूझकर
भूलने का दिखावा करता हूँ
मगर अंदर ही अंदर
हरा हो जाता है
कोई ठूंठ
फूटने लगती है
हरी-भरी शाखाएँ ।
सहसा
सिमट जाती हैं शाखाएँ
जब कहती है बिटिया
‘‘पापा अगली फोटो दिखाओ ना !’’

6.
पुराना एलबम देखने के बाद
लगता है
जैसे लौटा हूँ
अतीत की यात्र से ।
पत्थरों और शब्दों की तरह
फोटो में भी
बसता है इतिहास
पाकर नम निगाहों का स्पर्श
हो जाता है हरा
अतीत की किताब का
कोई पृष्ठ ।
फोटो की मार्फत
फिर-फिर लौटता है
इतिहास
वर्तमान में ।
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शनिवार, 28 मई 2011

म्हारै पांती री चिंतावां : आरसी हरफ़ रै आंगणै

रचनात्मक प्रतिबद्धता की अनुगूँज
अब तक हमने जितने भी क़िस्से-कहानियाँ सुने-पढे हैं, उन सब में अपने हिस्से के लिए, अपने अधिकारों के लिए जूझते-लङते इंसान से साक्षात् होते रहे हैं । अदालती दरवाज़ों में भी मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ वक़ीलों के बुलंद तर्कों की अनुगूँज सियासतदारों के आराम में ख़लल डालती रही है । ज़र, जोरू और ज़मीन के लिए रतनाती रेत वाले इस बियाबान में जब कोई व्यक्ति अपने हक़, अधिकार और हिस्से में धनात्मक अभिवृद्धि के मनुज-सुलभ फ़ॉर्मूले को छोड़कर बिलकुल अलहदा अंदाज़ में अपने हिस्से की चिंताओं, प्रतिबद्धताओं और सामाजिक सरोकारों व ज़िम्मेदारियों की बात करे तो मन उस पगलाये-बौराये से अनायास जुड़ जाता है । यह मानव प्रकृति है । धारा के विपरीत गतिविधि पर हमारा ध्यान तत्काल जाता है । अख़बारों में कुछ विज्ञापन छपते हैं, लिखा होता है - इसे न पढें, हमें उसे पूर्ण मनोयोग से और प्राथमिकता से पढते हैं ।

ठीक इसी तर्ज पर पाठक मदन गोपाल लढा की काव्य कृति ‘म्हारै पांती री चिंतावां’ की संवेदना से जुङता है । मैं भी इस उत्ताल संवेदना प्रवाह और सामाजिक प्रतिबद्धता के बहाव में बहने से स्वयं को नहीं रोक पाया ।

लढा की कविताओं का मुख्य-स्त्रोत सहजता, सरलता, सौम्यता और मानवीय नैसर्गिकता है । इन कविताओं में ग्राम्य जीवन की सहजता-सरलता है, तो शहरी जीवन की ख़ुद में सिमटे रहने की तटस्थता और रचनाकार मन की ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की सदाशयी प्रतिबद्धता भी है । कवि का मन शब्द, कविता, कवि और प्रणय की गहराईयों में डूबता-उतरता रहता है । वह सागर के गोताखोर की तरह डुबकी लगाता है और जो कुछ भी उसे हाथ लगता है, हमें पकड़ाता चलता है । लढा की यही ख़ास ‘ऑरिजिनेलिटी’ है । बनाव-श्रृंगार के षहरी दमघोटू वातावरण की तरह रची जाने वाली आज की कविता से सर्वथा अलहदा यह अंदाज़ लढा की कविताओं को पढने, जानने और समझने की ललक पैदा करता है ।
अन्तर्मन की अमूर्त संकल्पनाएँ लढा के काव्य में स्वतः उद्भूत संवेदनाओं के रूपाकार में पाठक के समक्ष उपस्थित होती है और उनकी यह काव्य-प्रकृति - आओ लढा को जाने’ का आह्वान करती है । इसी ताकत के बलबूते पर समूचे जगत की यात्रा कवि अपनी कविता में कर लेता है -
‘गुवाङ तो गुवाङ/म्हैं तो घूम लैवूं/आखै जग में/कविता रै ओळै-दोळै/ एकलो बैठ्यो ई...!’
पैमाईश की बात करें तो कवि का कर्म मार्मिकता और वैचारिकता है । कवि ने संग्रह की कविताओं में अपने अंतस की अकुलाहट और चिन्तनाओं को अलग-अलग बिम्बों के माध्यम से रचा और उकेरा है । वह बेहद सलीक़े से अपने भावों को एक के बाद एक रखता-जमाता गया है । तिलिस्म या शब्दाडंबर कहीं नहीं है । यह कवि की ख़ामोशियों का कोलाहल है । राजस्थान का लोक-जीवन और लोक-परिवेश अपनी समूची ऊर्जा, सौंदर्य, संघर्श और विद्रूप विसंगतियों के साथ इन कविताओं में पाठक से रूबरू होता है ।

स्मृतियों की जमीन तलाशता कवि कभी व्यवस्थागत बेबसी (कोनी चालै जोर) को रेखाँकित करता है तो कभी अर्थवाद की अंधदौड़ में अपनी अर्थवत्ता खोते शब्द को ढूँढने का उपक्रम दिखता है । हेत के रंगों से सरोबार हो कभी प्रीत के पन्नें हमसे साझा करता है तो कभी अपनी अधूरी अरदास के दुःख को सार्वजनिक कर कवि भाई को कवि कर्म के मूल्यों के अनुरक्षण हेतु संजीदगी बरतने का निवेदन करता दिखता है ।

कुछ वर्षों पूर्व एक पुस्तक छपी थी -‘वैनिशिंग वॉयसिस ।’ इस पुस्तक में भविष्यवाणी की गई थी कि अगर देशज भाषाओं ने अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष न किया तो वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप अगले सौ वर्षों में दुनिया की 90 प्रतिशत भाषाएँ ख़त्म हो जाएगी । ‘सरवाइवल ऑफ द फ़िटेस्ट’ की कहावत भाशाओं पर भी लागू होगी । इसी पीड़ को आत्मसात करते हुए लढा ‘म्हनैं म्हारी भासा चाईजै’ में कहते हैं -

‘म्हैं जाणूं / भासा बिहूणो हुवणो / कित्तो दुखदायी है / जियाँ गाय बिना खूंटो / टीकै बिना लिलाङ / अर मूरत बिना हुवै मिंदर / ठीक बियाँ ई / भासा बिना हुवै मिनख !’

लढा की कुरेदती-कचौटती इस दृढ-प्रतिज्ञ आश्वस्ति से मुझे शुकून मिला । ‘म्हारै पांती री चिंतावां’ लेकर मैं बाहर पार्क में आ बैठा ।

होली का त्यौंहार । बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे थे । सबके चेहरों पर इन्द्रधनुष पसरे हुए थे । मैं दो भागों में बँट गया । कभी होली के हुड़दंग के रंग मेरा ध्यान खींचते, तो कभी भाषा, कथ्य और चरित्र के तमाम बिंदुओं पर पूर्व स्थापित धारणाओं को जगह-जगह तोड़ती चलती और कविताई का नया मुहावरा गढ़ती लढा की कविताओं की आंतरिक बैचेनी जीवन के विद्रूप के बीच मनुष्य के लिए ‘स्पेस’ तलाशती मुझे कचोट गई ।

तुतलाती-बलखाती लड़की के गालों के गड्ढे में भरी हरी गुलाल देख कर लढाजी की ये पँक्तियाँ आँखों में तैर गई -

कैङी मुलाकात है आ / ओ म्हारी जोगण !/ ज्यूं-ज्यूं म्हैं थनैं जाणूं / खुदोख़ुद नैं बिसराऊँ/ अंतस री अँधेरी सुरंग में उतरूँ ! / सांची बता ! / थारै मिलणै रो मतलब / कठैई म्हारो गमणो तो कोनी ?’ (पृ.18)

मैं अभी इस प्रणयानुभूति में ही उलझा था कि बाहर शोर सुनाई दिया । किसी उत्पाती बच्चे ने उल्लास के अतिरेक के चलते पानी की बाल्टी भर कर लङकी पर डाल दी । प्रणय का हरा रंग पानी रंग में रंग अन्तर्मन को तलाशने लगा -

‘कोई ज़रूरी कोनी / कै सबद रो अरथ / असल ज़िंदगाणी में / बो ई हुवै/ जिको मंडयोङो हुवै / सबदकोस में/ आपरै सारू हरख रो मतलब / उछक हुय सकै / पण म्हारै खातर इण रो अरथ / फगत रोटी है !’(पृ.29)

पानी रंग की नमी से प्रभावित मैं अपने ही भीतर उतरने लगा । भाई लढा की दार्शनिक अभिव्यक्तियों के अर्थ तलाशने में जुट गया परन्तु तभी श्रीमतीजी की आँखों का लाल रंग मुझे भीतर तक कंपकंपा गया और लेनदारों की सूची हाथ में पकड़ा कर अर्थ की प्रभुसत्ता बता गया ।

‘मेह, मौत अर सपनां ई / अळघा है / बाज़ार री जद सूं / नींतर घर अर मन तांई / पूगग्या है उण रा हाथ / भाङै मिल जावै कूख तकात..!’(पृ.10)

रंग में भंग पङ गया । बैचेन मन मेरे चेहरे के पीले पङते रंग को देख कर बोल उठा -‘डग-डग डोलतो जीव / हियै रै आंगणै / झोला खावै / लारै भाजै / अेक अणखावणी छियाँ / दङाछंट !/ खुदोख़ुद सूं भाजतो जीव / अंतस री आरसी में सोधै/ अणसैंधा उणियारा / अर बांचै / ओळूं री धरती माथै / जूण रा आखर...!’ (पृ.9)

मन के विश्वास ने चेहरे के पीले पङते रंग पर सफ़ेदी पोती -‘रळ सको तो/ अेकामेक हुय जाओ /इण मुखौटा आळी भीङ में / का पछै म्हारै दांई / धार लेवो मौन !’ (पृ.20)

जीवन सत्य के सफ़ेद रंग ने धीरज की थपकी देकर मुझे आश्वस्त करना चाहा पर तभी किसी मनचले बच्चे ने दूसरे के चेहरे को काले रंग से पोत दिया और खिलखिलाने लगा । ‘ब्लैकरोज़’ बना बालक दरवाज़े के ग्रिल के बीच से मुझे निहारने लगा । मैं उसकी डरावनी शक्ल से बचने के लिए लढाजी की कविता पलटने लगा -

‘बा लपर-लपर कर’र बूक सूं / तातो लोही पीवै / अंधारघुप्प में बिजळी दांई चमकै / उण री आंख्यां / मून मांय सरणाट बाजै / उण री सांस / म्हैं एकलो / डरूं धूजतो......!’ (पृ.19)

रंगों की इस उठा-पटक से मैं विचलित था । मैं स्वयं को समेटने लगा । बच्चों के चेहरों में उनके नाम और पहचान एक हो गये । उन्हें अलग-अलग देख पाना अब सम्भव नहीं था । ठीक उसी तरह, जिस तरह लढाजी की कविताओं का वस्तु-वर्णन और भाव-वर्णन समग्रता के साथ समन्वित हो जाता है । रंग गड्ड-मड्ड हो गये और बन गया मटमैला रंग ।

-‘पैलङी तारीख नैं हाल सतरह दिन बाकी है / पण बबलू री फीस तो भरणी ई पङैला / मोखाण ई साजणो हुसी...!’ (पृ.63)

पल-पल दरकते रिष्तों को थामे रखने के कोशिश, परिस्थितिजन्य और परिवेशगत विद्रूप में उलझी आदमियत, रचनाकार का आत्म-संघर्ष, रागात्मकता की शून्यता और संवादहीनता की लौकिक चिंताएँ, जीवन स्थितियों से उत्पन्न धारणाएँ व बैचेनियों, छोटी-छोटी खुशियों में स्वप्न का संसार रचते मन की अभिव्यक्तियों और आभासी सुख की तलाश लढा की कविताओं में आकार लेती दिखती है ।

शब्द, कविता और प्रेम वह आधार है, जिस पर यह पूरी पुस्तक खड़ी है । अधिसंख्य कविताओं में कवि भिन्न-भिन्न कोणों से यही सब कुछ देखता है । यही इस संग्रह की सीमा है और यही वैशिष्ट्य ।

साफ़-सुथरे मुद्रण वाली इस पुस्तक की गुणवत्ता इसी से स्पष्ट है कि इसे प्रकाशन से पूर्व ही कमला गोइन्का फ़ाउण्डेशन, मुंबई का किशोर कल्पना कांत युवा साहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हो चुका है ।

कुछ कविताएँ ‘लाऊडनैस’ से नहीं बच पाई है और कुछ परिमार्जन की माँग करती है । बाजवूद इसके, आज की राजस्थानी कविता के मिज़ाज़ को जानने के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है ।

कृति- म्हारै पांती री चिंतावां
कवि- मदन गोपाल लढा
संस्करण- 2009
मूल्य- 120 रुपये
प्रकाशक- मनुहार प्रकाशन, महाजन (बीकानेर) ।

रवि पुरोहित
रिप्रोग्राफिक्स, पी.डबल्यू.डी.स्टोर के पास,
सदर थाना रोड,
बीकानेर (राजस्थान)-३३४००१
ravipurohit4u@gmail.com

रविवार, 3 अप्रैल 2011

राजस्थानी कहानी


फ़ुरसत

मूल- डॊ. मदन सैनी

बासठ वर्षों के बुजुर्ग मघजी अब तक यह नहीं समझ पाए कि जिस बात को वे समझ रहे है, उसे दूसरे लोग क्यों नहीं समझ पा रहे है। नहीं समझते तो मत समझो। उनको क्या फर्क पड़ता है। परन्तु फिर भी यह बात समझने की तो है ही। वैसे मघजी को अपनी गहरी समझ पर पूरा भरोसा है। इस समझ के कई पुख्ता प्रमाण भी है उनके पास। मां-बाप के मोभी पूत मघजी। मघजी के बापू व्यापार का ककहरा भी जानते, जिन्दगी भर सेठों के खेत-खलिहानों में काम करते रहे। कई बार अकाल भी पड़ा, तो घर में चूहों के फाकाकशी की नौबत आ गई। परन्तु मघजी के समझ पकड़ने के बाद घर में कभी तंगी नहीं आई। उनका व्यापार बढ़ने लगा तो निरन्तर बढ़ता ही गया। उनकी मेहनत रंग लाई। समझ के बल पर उनकी कीर्ति के स्तम्भ घर, गांव और गांव से बाहर तक स्थापित हो गए।बड़ी बेटी दुर्गा और मंझले मोहन के जन्म और विवाह की बेला में गांव में जैसा आनन्द-उत्सव हुआ वैसा न तो पहले कभी हुआ और न ही होगा। यदि होगा भी तो उनके ही सबसे छोटे बेटे के विवाह में, जो अभी बाकी है। मघजी के घर में आज कौन है ऎसा जो पहन-ओढकर बाहर निकले, और वाह-वाह न हो। दुर्गा की मां तो सोने से लदकर कनक-कांब जैसी लगती है, तो भला कौन नहीं सराहे। और ये सब गाजे-बाजे किसके भरोसे? निश्चित बात है-मघजी की समझ के बलबूते। फलों-फूलों से हरे-भरे बगीचे की मानिन्द है मघजी का घर-बार और अब तक जिसके बागवान थे खुद मघजी।मघजी को कुछ खबर भी नहीं लगी पर धीरे-धीरे व्यापार वाणिज्य की बागडोर मोहन ने सम्भाल ली। उनको तो तब ध्यान आया जब मोहन ने उनसे विनती की-अब आप साठी पार कर गए हो, यह उम्र आराम करने की है। आप देस जाकर घर-बार सम्भालों, कुछ ध्यान-धूप, पूजा-पाठ में मन लगाओ। बडे-बडे व्यापारियों को सलाह देने वाले मघजी को एकबारगी तो लगा कि उनकी समझ पंगु हो गई है। जिस समझ पर पूरी जिंदगी गुमान किया उनका ही सपूत उसे बिसरा रहा है। मगर मघजी सूझ वाले आदमी थे। सोच-समझकर घर रहना ही ठीक मानकर मंदिर-देवरा, पूजा-पाठ में ध्यान लगाने का मन बना लिया। ऎसा इरादा करना तो आसान था परन्तु इसमें मन लगाकर दिन काटना बहुत मुश्किल था। दिन उगता है तो छिपना मुश्किल और छिप जाए तो उगना कठिन। दिन बीते चाहे रात, मघजी को लगता जैसे युग बीत रहा हो।
"ऎसे तो पार नहीं पड़ेगी दुर्गा की मां।" मघजी ने अपनी पत्नी से कहा।

"ऎसे कैसे?"

"मंदिरों में घूमने से तो वक्त नहीं निकलता। मोहन ने पता नहीं क्या सोचकर मुझे दुकान से दूर किया है। उस बेवकूफ को कौन समझाए कि हमारे अनुभवों के आगे उसकी नई अक्कल पानी भरती है। सारी जिन्दगी की यही तो असली कमाई है मेरी, और उसने इसकी भी कद्र नहीं जानी।"

"नहीं जानी तो मत जानने दो। आप क्यों खुद का खुद जलते हो। मंदिर-देवरों में मन नहीं लगता तो घूम-फिर लिया करो। घर में सिनेटरी का पाखाना क्या हो गया आपको तो धोरे देखे भी युग बीत गया होगा।"

"तो तुम भी भला सीख देने लग गई?"

"अब इसे सीख समझो तो मेरे पास क्या उपाय है? मैंने तो आपके भले की बात कही है। जब से आपने काम छोड़ा, आपके चेहरे की उदासी मुझसे देखी नहीं जाती।"

"ठीक-ठीक..... में अभी जा रहा हूं धोरे.......।" कहकर मघजी मुस्कराते हुए पानी का लोटा लेकर धोरों की ओर चल पड़े। सर्दी के सूरज की तिरछी किरणें रेत की लहरों पर स्त्रेह के हाथ की तरह खिसकती जा रही थी। उन्होंने सोचा-समुद्र और रेत की लहरों में क्या फर्क है? यदि हवा हेत जताए तो दोनों खुश और यदि फंफेड़ने लग जाए तो तूफान का तांडव भी दोनों जगह एक सरीखा। इस धरती की काया में आप-अपना हिस्सा लिए रेत और पानी कितने मनमौजी, कितने आनंदित और कितने स्त्रेही जैसे दोनों को अपनी खूबसूरती का तनिक भी गुमान-गर्व नहीं है। अचानक उनको अपने पांव की अंगुलियों के पास सरसराहट महसूस हुई। नीचे देखा टीटण थी। उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर खासा दूर फेंक दी पर वह तो थोड़ी देर में ही फिर उसी जगह आ पहुंची। मघजी ने तीन-चार बार उसे फेंकी पर वह असली टीटण थी-धोरों धरती का हठीला जीव। हम्मीर ने अपना हठ छोड़ा हो तो यह छोड़े। मघजी तंग आ गए और लोटे का पानी को गटागट पी टीटण को लोटे में छोड़ दिया। फिर उन्होंने टीटण को नजदीक से देखना शुरू कर दिया। अरे! इसका चेहरा-मोहरा तो भंवरे से मेल खाता है। भंवरा इतना चहेता जीव और बेचारी टीटण से कोई बात भी नहीं करता। मघजी ने सोचा यह भंवरा भिनकारे का गीत गाता तितलियों और फूलों के नजदीक जा पहुंचा और कवियों की नजरों में चढ़ गया। परन्तु बेचारी टीटण को कौन पूछे?मघजी के मन में टीटण के साथ हुए अन्याय की बात उठी और उनको लगा जैसे उनके मन में नए ज्ञान का प्रकाश हो गया हो। उन्होंने टीटण को लोटे से लेकर हथेली में रखी। अरे! यह छोटा सा मुंह तो रेल के दानवी इंजन सरीखा लगता है। इसी प्रकार काला-कलूटा और बेरूप, क्या पता किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है कि नहीं। जाकर दुर्गा की मां को बताने से बहुत खुश होगी। उन्होंने टीटण को फिर लोटे में डाला और घर की तरफ रवाना हो गए।दुर्गा की मां माला फेर रही थी। मघजी को देखकर पूछा-"जा आए क्या?"

"एक बार माला छोड़, मेरे पास आ.......देख, मैं क्या लाया हूं-रेल का इंजन।"

"रेल का इंजन।" कहकर अचंभित करती हुई दुर्गा की मां उठी, "कहां है?"

मघजी ने दुर्गा की मां की हथेली पकड़कर उस पर लोटा उलटा दिया,"ध्यान से देख...."

"यह तो टीटण है.......।" इसका क्या चाव-दुर्गा की मां ने हथेली पलटते हुए कहा, हाथ में मूत दिया तो तीन दिन दुर्गन्ध नहीं जाएगी।"मघजी ने नीचे झुककर टीटण को अपनी हथेली पर रखा और उसे दुर्गा की मां के सामने करते हुए कहा, "अरी भागवान....एक बार इसे देख कर बता तो सही, यह कैसी लगती है?"

"कैसी क्या लगती है......बाहर फेंको इसे। बुढ़ापे में ये क्या तमाशा कर रहे हो, लोग हंसेंगे। कुछ तो सफेद बालों का कायदा रखो।"

"बस-बस, रहने दो। ज्यादा ज्ञान हो गया लगता है। सामने पड़ी चीज ही दिखाई देनी बन्द हो गई है। परन्तु गांव में समझदार लोग मरे नहीं है।" कहते-कहते मघजी ने टीटण फिर लोटे में डाली और तुरन्त बाहर निकल गए।सबसे पहले मुकना दिखाई दिया। मघजी ने उसको आवाज दी, "मुकना.........!""क्या काका....." पीछे देखते हुए मुकने ने पूछा।"ठहरो...देखो मेरे लोटे में क्या है!" पास आते ही उन्होंने लोटा मुकने के मुंह के आगे कर दिया।मुकने ने मंदे पड़ते उजाले में लोटे में झांककर देखा और बोला, "यह तो टीटण है, और क्या?"

"टीटण तो है, पर इसका मुंह कैसा है?"

"मुंह, इस बेचारी के कैसा मुंह, सपाट और गंदा।"

"रेल के इंजन जैसा नहीं लगता?" मघजी ने पूछा। मुकना मुस्कराया, "क्या बात है काका......? तबीयत तो ठीक है ना। कहीं भांग-गांजे की चपेट में नहीं आ गए?"

"जा-जा........कुछ देखना नहीं आया तो भांग-गांजे की बात करने लग गया। मैं तो तुम्हें दूसरों की तुलना में ठीक मान रहा था, तुम्हारे तो दिमाग में गोबर भरा है।" कहकर मघजी आगे चल पड़े। मुकने से मिलने के बाद मघजी कई देर तक गांव की गलियों में घूमे, परन्तु उनको किसी पर भी विश्वास नहीं हुआ। फिर कोई उलटा-पुलटा बोलेगा। मास्टर दीनदयाल को छोड़कर दूसरे किसी से बात करनी व्यर्थ है, पर मास्टर जी के घर बेवक्त नहीं जाऊंगा। यह सोचकर मघजी घर आ गए और सूरज ऊगने का इंतजार करने लगे। दिन ऊगा। मघजी ने स्नान वगैरह किया और स्कूल के समय से पहले मास्टर जी के घर जा पहुंचे। मास्टर जी खाट पर बैठे किसी किताब के पन्ने पलट रहे थे। घरवाली पशुओं की सार-सम्भाल करने गई थी।

"जय राम जी की....।" मघजी ने लोटे को हथेलियों के बीच लेकर रामा-सामा की। "आओ मघजी....। आज सूरज किधर से उगा है?" कहते हुए मास्टर दीनदयाल ने किताब एक तरफ रख दी।

"क्या बताऊं मास्टर जी........ " मघजी खाट पर बैठते हुए बोले, "गांव में कोई समझदार आदमी ही नहीं है।"

"क्यों, क्या बात हुई.....?"

"किसी को फुरसत ही नहीं है, कोई नई बात सोचने की, कहने की, समझने की। मैं तो कल से एक बात कहने के लिए घूम रहा हूं, पर कोई समझने के लिए तैयार नहीं है....।"

"ऎसी क्या बात है भला....?" मास्टरजी ने हंसकर पूछा। मघजी खुश होते हुए बोले "लोग फूल देखते है। तितलियों पर मोहित होते है, भंवरों के गीत गाते है, पर उनमे नई बात क्या है? केवल देखा-देखी। आप देखो इस टीटण का नया रूप, सबसे बढ़कर नहीं दिखे तो मुझे कहना।" कहकर मघजी ने लोटा मास्टर जी के सामने खाट पर उलटा दिया। एक हल्की सी "तड़" की आवाज के साथ अपने पंजे ऊंचे किए टीटण आ पड़ी। पड़ने के बाद उसके मुंह के "एरियल" और छहों पांव हवा से हाथापाई करते हुए तिरमिर हिल रहे थे। मास्टर जी को मानो करंट लग गया हो, वे उछलकर खड़े हो गए। इस अप्रत्याशित बात को समझने में उनको कुछ समय लगा, फिर गुस्से में बोले, "यह क्या तमाशा है, गांव में तो एक भी समझदार नहीं मिला पर आपकी अक्ल भी घास चरने गई लगती है। ज्ञान छांटने के लिए टीटण ही मिली, मैंने सोचा भले आदमी हो, सुबह-सुबह कोई काम की बात करने पधारे होंगे। अब आप घर पधारो........ नहीं तो लड़के पत्थर मारना शुरू कर देंगे।" मघजी को लगा कि वे पहाड़ के नीचे आ गए है। डगमगाते कदमों से वे कब मास्टरजी के घर से निकले और कब घर पहुंचे, उनको पता ही नहीं चला। घर पहुंचकर वे अपने ओरे में घुस गए। न कुछ कहा न ही सुना। किसी से बात तक नहीं की। उनको पता था कि उनका चेहरा अभी मोर से मिल रहा था, टप-टप आंसू टपकाते मोर से। अन्तत: दुर्गा की मां ने जाकर पूछा "क्या हुआ, आपके कहीं दर्द तो नहीं हो रहा?"

"दर्द है मेरे सिर में।" मघजी काटते हुए से बोले।

"स्याणों, ऎसे क्या बोल रहे हो?" दुर्गा की मां ने भी आंखे भर ली।

"मैं समझदार नहीं हूं, दुर्गा की मां....मैं पूरा डफोल, मूर्ख हूं।"मघजी की आंखे छलछला आई। उन्होंने अपनी धोती का पायचा आंखों पर रखकर सुबकना शुरू कर दिया। दुर्गा की मां बोलवा कर रही थी, "हे महाराज बालाजी, यह क्या हो गया बाबा, ऎसे सयाने-समझदार का दिमाग कैसे फिर गया। तुम्हारा जागरण बोलती हूं बाबा इनके आंसू पौंछ दो।" तभी कड़ी बजी। दुर्गा की मां ने पल्ले से आंसू पौंछते हुए मुख्य द्वार पर जाकर देखा, एक लड़का चमचमाता लोटा लिए खड़ा था। बोला, मास्टरजी ने यह लोटा पहुंचाया है। सुबह मघजी उनके घर छोड़ आए थे। मास्टर जी ने कहा है, टीटण नहीं मिली। मिलते ही पहुंचा देंगे। दुर्गा की मां ने झट से लड़के के हाथ से लोटा लिया और दरवाजा बन्द कर कुंडी लगा दी।


अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा

रविवार, 27 मार्च 2011

जान बचाना बन गया जीवन का मकसद

जरा हटके जान बचाना बन गया जीवन का मकसद हां चाह होती है वहां राह अवश्य मिलती है। बुलंद हौसलों के आगे सारे अभाव बौनेसाबित हो जाते हैं । पंचायत समिति लूणकरनसर के ग्राम खारबारा के निकट चक १एसएलडी निवासी ३७ वर्षीय भंवरलाल सुथार इसका प्रबल प्रमाण है। महज पांचवी तक पढ़े-लिखे भंवर लाल ने खेती बाडी व लकड़ी का काम करते-करते बोरवेलों में गिरे लोगों की जान बचाने वाला एक अनूठा यंत्र खोज निकाला है। समाचार पत्रों में प्रिंस आदि बच्चों के गिरने की खबरों से अन्य लोगों की तरह भंवरलाल सुथार भी चिंतित था इसी बीच छत्तरगढ़ तहसील के लाखनसर गांव में 5नवम्बर 2008 को एक ४ वर्षीय बालक प्रकाश मेघवाल ६५ फीट गहरे कच्चे बोरवेल मेंगिर गया। दुर्घटना की सूचना मिलने पर पुलिस प्रशासन के अधिकारी व समीपवर्ती क्षेत्र के लोग मौके पर पहुंच गए। प्रशासन के साथ आये बचाव कर्मियों ने रस्सीके आगे कपड़ा बांधकर उसमें बच्चे को बैठाकर बाहर निकालने का प्रयास किया मगर असफल रहे। घटना की सूचना मिलने पर भंवर लाल भी मौके पर जा पहुंचा। जहां बच्चेके माता-पिता का विलाप व लोगों के चेहरो पर पसरी उदासी के बीच उसने एक युक्ति सोची। मन में उपजी युक्ति को उसने उपनी अंगुलियों से धोरे पर पसरी रेत पर खींचकर खुद को आश्वस्त किया और प्रशासन की अनुमति से समीपवर्ती मंडी ४६५ आरडी जाकर आधे घण्टे में अपना उपकरण बनाकर फिर घटनास्थल पर पहुंच गया। सुथार के यंत्र से१५ मिनट में बच्चा जिंदा बाहर निकल गया तो लोगों को राहत मिली और भंवरलाल को भीअपने जीवन की एक नई दिशा मिल गई। तत्कालीन जिला कलेक्टर श्रेया गुहा ने गणतंत्र दिवस समारोह पर भंवर लाल को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया तो भंवर लाल ने भी कच्चे पक्के कुएं व बोरवेलों में व्यक्तियों के गिरने से होने वाली अनहोनी केखिलाफ जंग को अपने जीवन का मकसद बना लिया। भंवरलाल का मानना है कि हमारेक्षेत्र की मिट्टी कठोर नहीं है जिससे मशीन की खुदाई से बोरवेल में गिरे व्यक्ति को खतरा हो सकता है। भंवर लाल का उपकरण जीवन यंत्र लोहे की पत्ती सेबना हुआ है जिसमें लगी एक रस्सी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पैरों का कस लेती है वहीं दूसरा मोटा रस्सा उसे बोरवेल से बाहर खींचने के काम आता है। वर्ष २०१०में ११ मार्च को वैशाली नगर, जयपुर में उषा जैन (५२ वर्षीय) १४ इंच के बोरवेलमें गिर गई थी। आपदा प्रबन्धन महकमें के अधिकारियों ने भंवरलाल को मौके परबुलाया तो उसने ३ घण्टे की कड़ी मेहनत के बाद उसके शव को बाहर निकाल दिया।जयपुर जिले के गांव जगतपुरा में एक बच्चा १७० फीट गहरे बोरवेल में उल्टा गिरगया था मगर प्रशासनिक अधिकारियों ने भंवरलाल सुथार को वहां बुलाकर भी अपनेयंत्र के प्रयोग की अनुमति नहीं दी। इसी प्रकार टोंक के जहाजपुरा गांव में २२फीट गहरे बोरवेल में गिरे बच्चे की सूचना मिली मगर प्रशासन भंवरलाल को उनकेमशीन सहित वहां पहुंचाने के लिए गाड़ी उपलब्ध नहीं करवा पाया। इन दिनों भंवरलाल ने एक अन्य यंत्र तैयार किया है जो बोरवेल में बीच में फंसे हुए व्यक्ति को निकालने में कारगर है। पौने इंच के पाइप व एक रस्सी की सहायता से बना यह यंत्रबीच में फंसे व्यक्ति के पास जाकर एल का आकर ग्रहण कर लेता है जिसकी सहायता से७०-८० किलो तक वजन के व्यक्ति को बाहर निकाला जा सकता है।धुन के धनी भंवरलाल ने भले ही कुएं और बोरवेलों से होने वाली अनहोनी से लोगोंको बचाने का मिशन बना रखा हो मगर प्रशासन ने कभी उसकी मदद की पहल नहीं की है।उसके यंत्र को सुधारने के लिए उसे कभी कोई सहयोग उपलब्ध नहीं करवाया गया है ।कई बार दुर्घटना की सूचना के बावजूद प्रशासन उसको घटनास्थल तक लाने ले जाने केलिए वाहन उपलब्ध नहीं करवा पाता है। -मदन गोपाल लढ़ा

बुधवार, 24 नवंबर 2010

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

लोक के आलोक : नानूराम संस्कर्ता

(पुण्यतिथि २५ नवम्बर पर विशेष)

धुनिक राजस्थानी साहित्य के पुरोधा ख्यातनाम साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता सही मायने में लोक के आलोक थे. 21 जुलाई1918 को खारी में जन्मे नानूराम संस्कर्ता ने जीवन पर्यन्त गांव में रहकर साहित्य-साधना की. उनकीरचनाएं ग्रामीण जिन्दगी के सुख-दुख तथा आकांक्षा व अवरोधों का प्रामाणिक दस्तावेज है.देहात की दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा होगा , जो उनकी पारखी निगाहों से छूट गया हो.यह उनका अनुभव किया हुआ सच है, जो बिना किसी लाग-लपेट उनकी कलम से प्रगट हुआ है.अपने रचना संसार की तरह उनका व्यक्तिगत जीवन भी निर्मल एवं सरल रहा.शहरी जीवन की भाग-दौङ उनको कभी रासनहीं आई.बीकानेर जिले के काळू गांव में रहते हुए उन्होंने शिक्षा वसाहित्य की सेवा में अपन जीवन समर्पित कर दिया.राजस्थानी में 11 काव्य कृतियों, 7 कथा संग्रह तथा हिन्दी में 5 कवितासंग्रह , 3 कहानी संग्रह व 2 शोध ग्रन्थो के रूप मे उनकी सहित्यिक विरासत अत्यन्त समृद्‍ध है. उनका शोध ग्रन्ध ‘राजस्थान का लोक साहित्य’ बेजोङहै. ‘कळायण’ राजस्थानी प्रकृति काव्य में सिरमोर रचना है. उनका ‘ग्योही’ कथासंग्रह राजस्थानी कहानी की यात्रा में मील का पत्थर माना जाता है.काळू में 25 नवम्बर 2004 को अपनी आत्मा से पदार्थ उतार देने वाले मनीषी साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता का पुण्य-स्मरण करते हुए प्रस्तुत है उनकी एक कविता-
‘आज हरिया खेतां में छांवलो आवै
आभै लील गलै, वदळां री नौका कुण चलावै?
आज भंवरा फूलां नीं बैठै; थांरी जोत किरणां में
मतवाळा ऊंचा उडै चढै!
चातकङा रा जोङा, सरिता रै सारै कियां भेळा होर्या है?
साथीङां आज म्हैं घरै नीं जावूंला
आज म्हैं आभै झाङ, विश्व विभव लूंटणो चावूं.
आज समदरियै री उछाळ में झाग वणावूं;
झंझवात-हरखीली हंसी हंसै!
आज बेवजै मुरली वाजै-सारो दिन म्हैं वै में ही लगावूंला!

मदन गोपाल लढ़ा

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

मेहंदी, कनेर और गुलाब

राजस्थानी कहानी

मेहंदी, कनेर और गुलाब

मूल- श्रीलाल नथमल जोशी अनुवाद- मदन गोपाल लढ़ा
हमारे नए मकान में पौधों की दो क्यारियां हैं। वैसे तो मकान बने बीस वर्षो से अधिक समय हो गया, पर दूसरा मकान उससे भी पुराना है, इसी कारण दोनो का भेद बताने के लिए "नए" शब्द का प्रयोग किया है। एक रात मैं घर में अकेला था और आधी रात में मेरी नींद उचट गई। मैं छत से नीचे आया और दरवाजा खोलकर दो-चार मिनट गली में खड़ा रहा। दरवाजा बंद करके जब वापस लौटा तब लगा कि मेरे कानों में एक अद्भुत शक्ति पैदा हो गई है। ऎसा लगा कि मैं पेड़-पौधों की बोली समझने लगा हूं। मैंने वहीं पांव रोप दिए। यदि आहट हुई, तो वार्तालाप रूक जाएगा। कनेर ने मेहंदी से शिकायत की-"देख मेहंदी, तुम्हारी उम्र बीस वर्ष है। तुमने अपनी जिन्दगी के अठारह वर्ष व्यर्थ गंवाए हैं। तुम अब तक नहीं जान पाई कि प्रेम क्या चीज होती है।"मेहंदी-"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं।""दो वर्ष पहले जब मैं यहां आया था" कनेर बोला, "तब मैंने तुमको पारस्परिक प्रेम के सुख का अनुभव कराया।" मेहंदी बोली-"मैं तुम्हारा गुण मानती हूं।" "पर तू गुण भूल गई मेहंदी।" कनेर बोला। "तुम्हारा ध्यान अब मुझमें नहीं रहा।" "यह बात भी ठीक है।" मेहंदी ने कबूल किया। "पर यह कितनी बुरी बात है, मेरी रानी। वह रात याद कर जब तुमने मुझे अपने ±दय का राजा बनाया और वचन दिया कि मेरे सिवाय अब और कोई कभी तुम्हारे दय में आसन नहीं पाएगा। क्यों मेरी बात ठीक है ना?"मेहंदी ने कहा-"ठीक को तो ठीक ही कहना पड़ेगा।" "यदि मेरी बात ठीक है तो फिर तुम्हारा आचरण...." कनेर ने लांछन लगाया। मेहंदी बोली-"तू जोर से मत बोल। लोग सुनेंगे तो नाहक हमारी बदनामी होगी। तुम्हारे ऊंचे सुर से ऎसा मालूम पड़ता है कि तुम अब मुझे प्यार नहीं करते। अगर प्यार करते तो तुम्हारी बोली मधुर होती। प्यार की बोली कभी कड़वी नहीं होती।""मैं माफी चाहता हूं कि मुझे जोश आ गया, पर तुम्हारी सफाई भी तो मैं सुनना चाहता हूं।" "स्त्री का धर्म ही चुप रहना, बरदाश्त करना है। मेरा बोलना तुम्हे अच्छा नहीं लगेगा, इस कारण मेरा नहीं बोलना ही ठीक रहेगा।" कनेर ने अपना सुर संयत किया और मन में तसल्ली करली कि बगल में गुलाब गहरी नींद में है। फिर बोला-"तुम्हारे धीरज का तो मैं शुरू से ही प्रशंसक हूं, फिर भी मेरे प्रति तुम्हारी उदासीनता समझ में नहीं आती।" मेहंदी ने कहा-"अगर बोलूंगी तो तुम्हें दुख होगा, इससे अच्छा है कि तुम मुझे चुप ही रहने दो।" थोड़ी देर सन्नाटा रहा फिर मेहंदी बोली-"जब तुम यहां आए थे, तुम्हारी रग-रग जीवट से फड़कती थी और तुमने मुझसे बिना पूछे ही मेरा आलिंगन कर लिया। तुम्हारी यह हरकत उचित तो नहीं थी, पर एकांत देखकर युवक या युवती उसका लाभ उठाते ही हैं, यह सोचकर मैं चुप रह गई। दूसरी बात यह भी है कि तुम्हारे स्पर्श से मेरी वर्षों से सोई नसों में जीवन का संचार होने लगा।" "मुझे खुशी है कि तुम सच्ची और ईमानदार हो।" " परन्तु कनेर। मेरे दुर्भाग्य से तुम्हारा विकास नहीं हुआ। शायद यह भूमि तुम्हारे अनुकूल नहीं रही। यहां आने के बाद तुम लम्बाई में तो बढ़े पर सघन नहीं हुए, तना पतला रह गया। नतीजा यह हुआ कि जवानी में ही तुम्हारी कमर बूढ़ों से अधिक झुक गई। खुद का भार वहन करना भी तुम्हारे लिए भारी हो गया और तुम मेरे सहारे रहने लगे। बुरा मत मानना कनेर। सच प्राय: कड़वा होता है।" कनेर की वाणी में उदासी तो आ गई पर वह बोला-"तुम अपनी बात चालू रखो।" गुलाब की डाली हिलती देख कर मेहन्दी चुप हो गई। फिर बोली-"कहीं हम गुलाब की नींद खराब नहीं कर दें। हमें अब चुप रहना चाहिए।" "तुम्हारी मरजी अगर तुम बात नहीं करना चाहोगी तो मैं जबरदस्ती तुम्हें बोलाने से रहा।" मेहंदी ने कहा-"मैं तुम्हारा भार दिन-रात वहन करती हूं पर फिर भी मैंने तुम्हें अलग करने की चेष्टा नहीं की। जब मैंने तुमको अपना लिया तो प्रेम निभाना मैं अपना फर्ज समझती हूं।" "तुम सच कहती हो मेहंदी?" कनेर ने तपाक-से पूछा। "मगर कनेर।" मेहंदी बोलती गई, "मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरी उमंग में बाधक बनो।" "मैंने कौनसी बाधा डाली है भला।" कनेर बोला। "गुलाब से मेरा सम्पर्क तुमको अच्छा लगता है?" मेहंदी ने पूछा। कनेर से कहा-"यह भी कोई पूछने की बात है? इसका जवाब तुम अच्छी तरह जानती हो।" "मैं सोचती हूं तुमको यह पसंद नहीं है। तुम जवानी में ही बूढ़ा गए, मेरे सहारे दिन काट रहे हो, काटो, तुम्हें इनकार नहीं, पर जब मेरी खुशी तुम्हें अखरती है तब कैसे पार पड़ेगी? जब यहां हम दो थे तब तुमने पहल की और मैंने स्वीकार। अगर तुम कुछ लायक होते और मेरे बर्ताव में फर्क आ जाता तब भी तुम मुझे कहने के हकदार होते। मगर तुमसे राम रूठ गया और मेरे भाग से गुलाब यहां आ गया।" "मेहंदी। मुझे दुख इसी बात का है कि मेरे निर्दोष रूप-व्यवहार के बाद भी कांटों वाला गुलाब तुम्हारे चित्त चढ़ गया।" मुझे खांसी आने वाली थी, पर मैंने खांसी एकदम रोक ली। मुझे याद नहीं कि मेरा सांस भी उस वक्त रूका हुआ था या चालू, कारण मुझे डर था कि कहीं मेरी थोड़ी-सी आहट भी इस वार्तालाप को बन्द कर सकती है। मेहंदी ने कहा-"कनेर। नाराज मत होना। अपने गुण पहाड़ जैसे व दूसरों के तिल जैसे लगना आम बात है। तुम्हें अपनी कूब नहीं दिखती है, गुलाब के कांटे नजर आते हैं। शायद तुमको पता नहीं कि उसके हरेक कांटे में पुष्प और पत्ते समाए हुए हैं। जिस गुलाब के पड़ोस से वातावरण महकता है उसमें कोई नई बात नहीं है पर जिस मिट्टी में वह उगता है वह भी सौरभ से धन्य होने लगती है। जो लड़कियां समझदार होती हैं वे लड़कों के रूप-रंग से ज्यादा उनके गुणों पर ध्यान देती हैं।" मेरे कान चोटी तक खड़े हुए-अरे। ये पेड़-पौधे भी आपस में लड़के-लड़कियों की बातें करते है। मेहंदी ने बात चालू रखी-"गुलाब की छुअन मेरे पत्तों को बेध देती है, पर उसके यौवन व गुणों के कारण यह हरकत भी मुझे प्रिय लगती है। मेरा एक-एक पत्ता उससे संसर्ग करके बिंधने के लिए तैयार है-उसमें ओज है, उसकी गंध में मादकता, मिठास है, उसके फूलों में रस है, रूप है। कमी क्या है, मैं नहीं जानती। अगर तुम समझा सको तो मेरे दिमाग के दरवाजे खुले है।" कनेर कुछ नहीं बोला। मेहंदी ने कहा-"कनेर मुझे दुख है कि मेरे मुंह से ऎसी कई बातें निकल गई जो तुम्हें बुरी लगी होगी। इसी कारण मैं बोलना नहीं चाहती थी, पर जब वाद छिड़ जाता है तो बोलों पर काबू नहीं रहता। मैं अब भी तुम्हें विश्वास दिलाना चाहती हूं कि गुलाब से मेरे सम्पर्क का मतलब तुम्हारा तिरस्कार नहीं है।" एकाएक गुलाब की एक कली चटकी और हवा में महक पसर गई। गुलाब की हरकतों से ऎसा लगा कि वह जाग रहा था और नींद का दिखावा कर रहा था। मेहंदी जब चुप हो गई तब गुलाब बोला-"कनेर, मुझे लग रहा है कि मेरे आने से एक गृहस्थी की सुख-शांति में विघA पड़ गया। मैं यहां आ तो गया हूं, पर यहां से जाना मेरे हाथ में नहीं है। मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे रहने से तुम्हें कष्ट हो। मेरे लिए एक ही धर्म है-सुख-शांति की यथास्थिति में छेड़छाड़ नहीं करना। तुम्हारी आत्मा को ठेस पहुंचाऊं तो मेरा जीना बेकार है। इससे तो अच्छा यही होगा कि मैं तुम्हारे लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दूं। यहां से जाना तो मेरे बस में नहीं पर अनशन करके सूख जाना तो मेरे हाथ में है। फिर तुम दोनों चैन से रहना।" मेहंदी की काया कांप गई। उसकी रग-रग गुलाब की इस भविष्यवाणी से रोने लग गई। कनेर भी थर-थर कांपने लगा। बोला-"गुलाब तुम संत हो। मैं अब तक तुमको महज कामुक मानता था। वास्तव में मेरे जीवन में अब कुछ शेष नहीं रहा। शायद कल तक बागवान आएगा और मुझे उखाड़ कर गली में फेंक देगा। मेरी दुआ है कि तुम दोनों फलो-फूलो।" मैं छत पर गया और सो गया। मेरे कानों में आवाज गूंजती रही-तुम दोनों फलो-फूलो.... इसके बाद कई बार मैंने पौधों की बातचीत सुनने की कोशिश की पर घंटे-दो-घंटे इंतजार के बाद भी कभी एक फुसफुसाहट की भनक तक कान में नहीं पड़ी।